स्मृति

“कौन?”
स्मृति की आवाज़ मेरे कानो मै गूूंजी ।
“कौन हो ?”
मैंने दरवाज़े पे एक कड़ी चोट मारी, जैसे वह दरवाज़ा मेरे ही ज़मीर का कोई अंग हो।

स्मृत अब स्मृति हो चुकी थी ।
मैं अनामिका ही थी, वही हूँ और वही रहूंगी।
न किसी धारणा से बंधी, न इतिहास से कटी, बस अपने ही विश्वास तले कुचली - "अनामिका"

हमारी दोस्ती के ३५ साल।
एक तरफ़ा प्यार के ३३।
मेरी शादी के ३० साल।
उसके स्मृत से स्मृति बनने के २०।

गिनना अब छोड़ चुकी हूँ। हर हफ्ते रविवार का दिन मैंने चुन लिया है।
एक दिन प्यार के खिलने का और उसके खिलखलाने का -
अनामिका और स्मृति के मिलन का दिन
और

स्मृति ने पूछा
“कौन हो?”

अजय माहेरचंदानी

अजय मुंबई विद्यापीठ से एल एल बी कर रहा है| उसे घूमने और कविताएँ लिखने का शौक़ है| अजय सोंचता है कि हमारे सामाजिक जीवनों में बुनियादी बदलाव लाना ज़रूरी है, ताकि सभी लोगों को बराबरी के अवसर मिल पाएँ|