रूबरू

(इस कहानी में जगह, पात्र और परिस्तिथियाँ पूर्णतः काल्पनिक हैं और लेखक के जीवन से ही प्रेरित हैं.)

पिछले पांच मिनट से मैं हॉस्टल के मेन गेट पर बैठा हूँ और आते-जाते लोगों को टुकुर-टुकुर देख रहा हूँ. ईशान से मुझे यहीं पर करीब पंद्रह मिनट बाद मिलना था पर मेरी बेसब्री मुझे समय से पहले ही मिलने के लिए खींच लायी. अब मेरे पास फ़ोन न होने की वजह से करीम चिकेन की घडी में समय देखने के और सुन्दर लड़कों को मन ही मन सीटी मारने के अलावा कुछ नहीं था मन बहलाने को. कुछ चार दिन पहले ही मैं नहर की और जाते हुए अपना बटुआ और फ़ोन रास्ते में गिरा आया था. नया फ़ोन लेने में, एफ़.आई.आर. कराने में, नयी सिम लेने में समय लग जाता है और इसलिए मैं आज बिना कैंडी क्रश के सहारे के यहाँ गेट पर खड़ा था.

ईशान से मिलने की बेसब्री मुझे हमेशा से नहीं थी जबकि हमारी पहली बार बात छः महीने पहले ही हो गयी थी. मुझे अच्छे से याद है कि मैं अपने घर पर था और बाहर गद्दीदार सोफ़े पर पड़ा हुआ था. दिवाली की शाम थी वो. मम्मी पूजा की तैयारी कर रही थी, बहन रंगोली का सामान लेने गयी थी और पापा पकोड़े तल रहे थे. छुट्टी लेकर और छह घंटे बस में लदकर आने का फायदा ये था कि घरवालों ने मुझे काम करने से आज़ादी दे दी थी. आलस की जकड़ में पड़ा मैं ग्राइंडर पर आस-पास के लड़के ताक रहा था पर कोई ढंग का बंदा था नहीं जिससे थोड़ी देर बात की जा सके. हार मानकर मैं अपनी बहन की मदद करने के लिए उठने ही वाला था जब ईशान का मेसेज आया: "रुड़की में कहाँ से हो?"

दिल्ली में सभी लोग रुड़की नाम सुनते ही भौहें सिकोड़ लेते थे, अगर कोई आकर यह पूछ ले की रुड़की में तुम कहा से हो तो ये काफ़ी है किसी आलसी इन्सान को झट से बैठने पर मजबूर करने के लिए. ऐसे हुई हमारी बात शुरू. पता चला कि वो अभी रुड़की में था, दिल्ली में नहीं. ईशान एक मीडिया प्रोफेशनल था जो दिल्ली में काम करता था मगर रहने वाला रुड़की के खंजरपुर का था. वो भी उसी दिन दिल्ली वापिस आ रहा था जिस दिन मैं रुड़की जा रहा था; आखिर दोनों की छुट्टियाँ बराबर ख़त्म हो रही थीं. येल्ले! तब तक मम्मी ने पूरे घर को बुला लिया था पूजा के लिए और मैं भूल गया मेरी ईशान से कभी बात भी हुई थी. कब पकोड़े ख़त्म हो गए और कब छुट्टियाँ बीत गयीं, पता ही नहीं चला. मैं रुड़की चला आया और ज़िन्दगी की गाड़ी पटरी पर ऐसे ही दौड़ने लगी जैसे कभी वो दिवाली के स्टेशन पर रुकी ही नहीं थी.

"भैया, किसी का इंतज़ार है क्या?"

मैंने अपनी यादों के घोड़ों को लगाम दिया और आवाज़ का स्रोत ढूँढा. देखा ठीक मेरे पीछे अपने कामचलाऊ टेंट में बैठा फूलवाला मुझी से कह कर रहा था. ये फूलवाला हमारे कॉलेज में विश्व-प्रसिद्ध था. ये उतना ही पुराना लगता था जितनी पुरानी उसके पीछे कॉलेज की पीली काईदार दीवारें. सफ़ेद बाल, साफ़-सफ़ेद कुरता और सफ़ेद लम्बी दाढ़ी (जो नीचे की तरफ पतले धागे से बंधी हुई थी और एक टंगे हुए परदे की तरह लगती थी)... फूलवाला एक बूढ़े फ़रिश्ते की तरह चुपचाप कोने में फूल पिरोता रहता था. लेकिन वो सब जानता था कॉलेज के बारे में. उसके गुलाब ही तो प्रेमी-जुगल बनते-बिगड़ते देखते थे. उसी के गेंदे-चमेली हर शादी-त्यौहार पर ख़ुशी बरसाते थे. जब भी कोई बड़ा लेक्चर होता था तो बच्चे एक दिन पहले फूलवाले को बता देते थे और दोपहर तक फूलवाला अपने लोगों को भेजकर स्टेज को फूलमालाओं से चकाचक सजा देता था. रुड़की में फूल बेचने वाले तो बहुत थे मगर फूलवाला एक ही था.

"हाँ भैया." मैंने आज तक फूलवाले से कभी बात नहीं करी थी.

"किसका इंतज़ार है?" फूलवाले ने थोडा हँसा और मेरी तरफ इशारा किया. मैं समझ गया और खुद को बाइक के शीशे में देख के शरमाने लगा: मैंने आम कॉलेज के बच्चे से कुछ ज्यादा ही सुन्दर कपडे पहने थे; ईशान से मिलना जो था. रुड़की में गे लोगों का थोड़ा अकाल है. जब मुझे कल पता चला की ईशान जैसे बढ़िया आदमी से आज मुलाकात होने जा रही है तो मैंने बन-ठन के मिलने की ठान ली. पांच बजे ही चला गया था नहाने. थोडा ज़्यादा शैम्पू लगाया, थोड़ी और देर साबुन रगड़ा, गर्म पानी से पैरों को मुलायम किया, माउथवाश से कुल्ला किया और उबटन लगाये. नतीजा फूलवाले के इशारे थे जो मेरे चमकते चेहरे पर सवाल उठा रहे थे.

"भैया, है एक दोस्त. छह महीने बाद मिल रहा हूँ उससे. जब वो रुडकी होता है तब मैं दिल्ली होता हूँ, जब मैं रुड़की होता हूँ वो दिल्ली होता है. आखिरकार दोनों एक ही शहर में हैं तो मिलना तो बनता ही है."

"काफी अज़ीज़ दोस्त है, नहीं?" फूलवाले ने पूछना नहीं छोड़ा.

करीम की घड़ी को आठ बजने में अभी 5 मिनट बाकी थे. मैं बाइक पर बैठे-बैठे घूम गया ताकि फूलवाले से बतिया सकूँ. मेरे पास फ़ोन तो था नहीं और टाइम पास करने के लिए मैं काम ढूंढ रहा था. फूलवाला ही सही. पर फूलवाले को मैं बता नहीं सकता था की मैं गे हूँ. इसीलिए मैंने उसके प्रश्न का जवाब नहीं दिया. वो लगातार मशीन की तरह फूल बुनते जा रहा था. मैं चुपचाप गौर से देखने लगा जब कुछ देर बाद फूलवाले ने ही सिर उठाकर टोका: "फूल ही लेते जाओ अपने दोस्त के लिए?"

नहीं. ईशान को फूल देना ठीक नहीं था. हम पहली बार मिल रहे थे. हम क्यूँ मिल रहे थे अभी तो ये भी तय नहीं था. मैं तो इतना जानता था की मैं कॉलेज के बाहर रुडकी में किसी गे इन्सान से मिलना चाहता था. मेरे डेढ़ साल में ऐसा अब तक एक बार भी नहीं हुआ था. कोई मिला ही नहीं था. अब जब मेरे पास थोड़ा खाली टाइम था तो मैंने इस मौके को जाने नहीं दिया. पर ये भी था की ईशान से मिलने की इच्छा कल उससे बात करने के बाद कुछ ज्यादा ही प्रबल हो गयी थी.

मेरे फ़ोन खोने के बाद से ही दिल्ली में माँ-बाप परेशान थे और कॉलेज में दोस्त, क्योंकि वो मुझसे बात नहीं कर पा रहे थे. इन्टरनेट के भरोसे गुज़र-बसर चल रही थी. ईशान का मेसेज भी मिस हो जाता अगर मैं कल शाम को फेसबुक चला के ना देखता. उसने दोपहर का मेसेज किया हुआ था कि वो रुड़की में है. दिवाली के बाद जब भी वो रुड़की आता था ऐसा मेसेज हमेशा कर देता था मगर कमबख्त मैं भी तब दिल्ली होता था: हम दोनों को एक-साथ छुट्टी पर घर जाने की सूझती थी. इस बार ही हुआ था की मैं घर नहीं गया था. होली की लगातार 4 छुट्टियाँ चल रही थीं.

देर शाम को जब कहीं मैंने उसका मेसेज पढ़ा तो झट से वापिस कहा कि मैं भी रुड़की में हूँ. देखते ही देखते दोनों तरफ से मेसेज की बौछार हो गयी. पांच मिनट बाद स्काइप कॉल हुई और तय हो गया आज शाम मिलने का. हमें मेन गेट पर मिलना था. उसके बाद देखना था कि कहाँ जाना है और क्यों.

ईशान मुझे काफी मजाकिया लगा. जब मैंने बताया कि मैं घर नहीं गया क्यूंकि घर पर अंकल गुज़र गए थे और इसलिए त्यौहार नहीं मना सकते थे, तो उसने बात हवा में उड़ा दी. उसने मुझे सलाह दी की मैं पतंग उडाऊं. त्यौहार मनाना मना था, मज़े करना थोड़े ही. फिर बोला, कि उसे मैं बहुत सुन्दर लगा. मैं कैसे ना शर्माता? मेरे गालों की लालिमा पर किस करने के वादे करके और ऐसी कुछ और ऊट-पटांग बातें करके उसने फ़ोन रख दिया. मगर मेरे मन में खलबली जारी थी. क्या मैं चाहता था उसका किस? पता नहीं, पर मैं पहुच तो गया ही था ईशान से मिलने और उसके साथ पतंग की तरह हिचकोले खाने. मगर ईशान का कोई अता-पता नहीं था. करीम की घड़ी 10 मिनट पहले आठ बजा चुकी थी और बेझिझक आगे बढ़ती जा रही थी.

"भैया, दोस्त आ रहा है. मैना थोड़ी आ रही है." मैं जितना ईशान को जानता था, मैं उसको मैना ही बनाना चाहता था. मगर फूलवाले को यह जानने की ज़रूरत नहीं थी.

"तो फिर अपनी मैना के लिए ही ले जाओ. कहाँ पर है वो?"

"नहीं है भैया रे. ना ही कभी होगी. नहीं देखत हैं नैना, क्या तोता क्या मैना." मेरे ऐसा कहते ही भैया ने जोर से एक ठहाका लगा दिया और बोले, "बाबूजी, सारी ज़िन्दगी यहाँ बैठ के ही काट दी है. चुटकी में समझ जाते हैं की किससे मिलने जा रहे हो और क्यों." मुझे थोड़ा बुरा लगा की फूलवाला मेरी मेरी बात पर यकीन नहीं कर रहा था. पर वो सच ही तो कह रहा था.

"कितने टाइम से आप यहाँ पर बैठते हो?" उत्सुकता हुई मुझे.

"बाबूजी पूरे 19 साल होने को हैं. एक लड़की विदा कर दी है और 5 पोते-पोतियाँ मिल गए हैं मुझे. आपके जोशीजी मुझे बहुत मानते हैं. 15 साल पहले आये थे वो यहाँ और तब से जानते हैं हम एक दूसरे को." उसकी छाती फूल गयी ऐसा कह कर. प्रोफेसर जोशी कॉलेज के डिप्टी डायरेक्टर थे. भैया ने रुक के मेरी तरफ देखा.

"वाह भैया! कुछ बताओ जोशीजी के बारे में." सब डरते थे डिप्टी डायरेक्टर से. आज मौका था उनकी बातें खोद के निकालने का तो रहा नहीं गया.

"क्या बताऊँ बाबूजी. " उन्होंने फिर से फूल गूंथना शुरू कर दिया. "जोशीजी बहुत ही भले आदमी हैं. कुछ साल पहले मेरी हालत उतनी अच्छी नहीं थी. हमारी माँ बीमार रहती थी तो दवा-दारू के लिए जोशीजी ने अन्दर कॉलेज के हॉस्पिटल में उनका इंतज़ाम किया था. जोशीजी ही थे जो नगरपालिका से खड़े हो कर लड़े थे जब वो हमें यहाँ से उखाड़ फेंकने आई थी. हमेशा हमसे ही फूल लेकर जाते हैं. फूल की क्या बात कर रहे हैं? अपने बड़े लल्ला की शादी में हमें सादर आमंत्रित किया था उन्होंने हमें. आते-जाते सलाम करते हैं. बहुत पुराना रिश्ता है उनसे हमारा." उनकी आँखें भी ऐसे ही चमक गयी जैसे उनके हाथों में चमेली के फूल. बातों ही बातों में एक गजरा तैयार हो गया था.

"बहुत ही सुन्दर है भैया आपका काम." वाकई में था.

"तो लो. मेरा सुन्दर काम आपका हुआ." और बिजली की रफ़्तार से मेरे सामने अख़बार में लिपटा हुआ गजरा था. मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा था की भैया को कैसे समझाऊँ कि मैं जिससे मिलने जा रहा था वो गजरे नहीं लगाता. मगर गजरा था सुन्दर, भैया की आँखें निष्कपट... मैंने रख लिया.

"आपको मैंने कई बार देखा है यहाँ से गुज़रते हुए", फूलवाला बोला. फूलवाले ने मुझे देखा हुआ है, ये मुझे थोड़ा अजीब लगा. कॉलेज में हजारों बच्चे इधर से गुज़रते हैं. अगर मुझे शक हुआ की ऐसा क्यों है तो मैंने ज़ाहिर नहीं होने दिया.

"आपसे कोई भूल हुई होगी, भैया."

"आप ही तो हैं बाबूजी जो एक गुलाबी पजामा पहन के रोज़ सुबह साइकिल पर चह्चहाते हुए निकलते हैं." ये सवाल नहीं था. मुझे पता था की मेरा पजामा लोगों को आकर्षित करता है. पर फूलवाला मुझे याद ही रख लेगा, ये नहीं सोचा था. मैंने फूलवाले की तरफ़अलग तरीके से देखा. और क्या-क्या पता था उसे? मुझे जानने की इच्छा हुई. क्या उसे लगता था मैं गे हूँ? अगर मैंने गजरा ईशान को दिया तो क्या फूलवाला समझ जाता?

"हाहा! हाँ भैया. वो पजामा बहुत पसंद है मुझे."

"मेरी पोती को भी गुलाबी रंग बहुत पसंद है. गुलाबी ही क्यों, गुलाब भी. शैतान कहीं की, रोज़ मुझसे एक गुलाब मांगती है वो." और यूं वो अपनी पोती की कहानियों में मशगूल हो गए.

करीम की घड़ी अब आठ बज कर 20 मिनट बजा चुकी थी. ईशान अब भी नहीं आया था. थोड़ा गुस्सा आया मुझे. गजरा उसे तो कतई नहीं दूंगा. 'यहाँ मैं उससे मिलने के लिए कब से खड़ा हूँ और वो है की देरी कर रहा है.' मेरे पेट में भी चूहे दौड़ने लगे थे. वहां फूलवाला अपनी कहानियां बताये जा रहा था और मालाएँ पिरोये जा रहा था. मुझसे और बैठा नहीं गया वहां पर, एक बेचैनी छा गयी. मैं उठ खड़ा हुआ.

"क्या हुआ? दोस्त आ गया क्या आपका?"

"नहीं भैया. पर थोड़ी भूख लग गई. क्या कहते हैं? चाय पी आऊँ थोड़ी सी?"

"हाँ हाँ, ज़रूर जाइये बाबूजी." ऐसा करके मैंने फूलवाले से विदा माँगी और सामने करीम से चाय लेने चला गया. बाहर कुर्सी पर बैठ गया. एक आँख चाय पर थी और एक सड़क पर. निकलने से पहले मैंने ईशान को फेसबुक पर मेसेज तो कर ही दिया था कि मैं कौन से कपड़ो में बैठा हूँ. वो स्कूटी पर आने वाला था. लेकिन वहां पर खुले आसमान के नीचे शांत कॉलेज था, रिक्शेवालों की कतार थी और मेरा मचलता हुआ मन था. इंतज़ार करते हुए मुझे अब 40 मिनट से ऊपर हो चले थे. मेरा ईशान से मिलने का जोश चाय के साथ-साथ ठंडा पड़ता जा रहा था. मैं उसको अपनी उँगलियों में ऐसे लपेटे था जैसे वो मुझे आज बचा लेगी दर्द से. कॉलेज के बच्चे करीम के अन्दर हंस रहे थे, ठिठिया रहे थे, चिल्ला रहे थे. और उनकी बातें सुन-सुन के मुझे इर्ष्या हो चली थी. मेरा ईशान नहीं आया था वहां पर! ना ही मेरे पास कोई जरिया था ये पता करने का की वो आएगा भी या नहीं.

कल फ़ोन रखने से पहले ईशान के शब्द थे: "कल मिलना मत भूलना." और मैं नहीं भूला. छुट्टी होने के बावजूद काम की कमी नहीं होती मेरे पास. मैं तब भी उससे मिलने आया और उसने धोखा दे दिया. मेरे एक गे दोस्त ने बताया तो था की ऐसा आम है कि कोई किसी को मिलने के लिए बुलाता है और फिर दूर से देखता है. अगर पसंद आता है तो पास जाता है वरना दूर से ही राम-राम. ऐसा तो वो लोग करते थे जो बहुत डरे हुए होते होंगे. क्या ईशान भी? बातें करने में तो ईशान कहीं से भी डरा हुआ नहीं लग रहा था. क्या मैं इतना बदसूरत लग रहा था?

चंद पलों में मेरा मुंह उतर गया. ये सबसे बुरी अनुभूति थी. जिस लड़के ने मुझे "क्यूट" कहा था, वो मुझे ठीक से मिले बिना ही चला गया? अजीब-अजीब से ख्याल घर करने लगे थे अब. क्या पता ईशान को कुछ हो गया हो? मगर चाह के भी चिंता नहीं हो पा रही थी. आखिर अकेला छोड़ दिए जाने का दुःख ही इतना था. सामने फूलवाला था जो मुझपर कई बार नज़र डाल चुका था. उसके बगल में ही मेन गेट था जो मुझे अन्दर आने का आमंत्रण दे रहा था. मैंने 5 मिनट और रुकने की ठानी. मैं सीधे सामने फूलवाले के पास गया और उसे गजरे के पैसे देने के लिए बटुआ निकला.

"अरे बाबूजी! गजरा तो हमने आपको प्रेम से दिया था. ऐसे उसकी कीमत मत तौलिये तराजू में."

"भैया आज मेरे पास हैं तो दे रहा हूँ. कल नहीं होंगे तो आप ही के घर में घुस के बैठ जाऊँगा मैं."

"बिलकुल सरकार! ऐसी भी क्या बात कर दी." ऐसा करके उन्होंने 20 रुपये रख लिए.

"वैसे रहते कहाँ हैं आप?" मैंने पूछा.

"खंजरपुर में." यह रुड़की में ही एक कॉलोनी थी. रुड़की की थोड़ी बेहतर जगहों में ही आती थी. मुझे ताज्जुब हुआ.

"आपके बच्चे? वो कहाँ हैं?"

"एक दिल्ली में है और एक रुड़की में ही है. अब मुझे काम करने की इतनी ज़रूरत नहीं है पर घर नहीं बैठा जाता. और यहाँ पर आप जैसे बच्चों के साथ रहकर दिल बहल जाता है. छोटा बेटा अभी यहीं आने वाला था. कल ही आया था तो कह रहा था शाम को आपसे मिल कर जाऊंगा."

मेरे कान खड़े हो गए: "शादी हो गयी उसकी?"

"अभी कहाँ. 2 साल हुए हैं काम करते हुए. कल दिल्ली था, आज रुड़की है, कल दिल्ली चला जाएगा."

जाने से पहले बस आखिरी बार पूछना बचा था: "कब आना था उसको आपके पास?"

"देर हो गयी है उसे. आ जाना चाहिए था उसको अभी तक. कहा था 8 बजे के आस-पास आ जाएगा." हे राम! ये कैसे हो सकता था. क्या इसलिए नहीं आया वो? मैंने जाने के लिए मुह मोड़ा पर ना चाहते हुए भी मैंने खुद को बाइक के शीशे में देखा. 'इस बन्दर से मिलना भी कौन चाहता!' मैं भी क्या समझ बैठा था. दाढ़ी थोड़ी बढ़ी हुई थी. बाल बिखरे से थे, मुह पतला-सा था. हवा में झूलती हुई मेरी हड्डियों को कोई कैसी ही तो पसंद कर सकेगा. स्काइप पर मुझे छुपाना आसान था, मगर असलियत में नहीं. मुझे मेरा एक दोस्त याद आ गया जो 30 का होने वाला है और एक लड़की से शादी करने वाला है. पूरी ज़िन्दगी गे दुनिया में ठोकर खाने के बाद जब उसको अकेलापन मिला तो वो शादी की तरफ मुड़ गया. क्या मैं उसको कुछ कह सकता था? क्या मैं अभी खुद को कुछ कह सकता था?

मैं भैया से कुछ और पूछना नहीं चाहता था. भरे दिल से मुड़ा तो एक शोर मेरे बहुत पास, बहुत जल्दी आकर खड़ा हो गया, गजरा छूट गया. फूलवाला भी डर के चिल्ला दिया, "इशान!" मैंने देखा तो स्कूटी के ऊपर लड़का बोला, "अल्ताव!"

उसका चेहरा भी ऐसे ही चमक रहा था जैसे उसकी स्कूटी की हेडलाइट. मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था, बोलना तो दूर की बात है. फूलवाला ज़रूर बोला, "क्यूँ बे इशान, यहाँ क्या कर रहा है?"

"कुछ नहीं, ये मेरा दोस्त है. इससे मिलने आया था."

"ओह हो! तो ये तुम्हारा दोस्त है? पता है इसने कितना इंतज़ार किया है तेरा? कब से बेचारा यहाँ मोड़ पे तैयार खड़ा है तुझसे मिलने के लिए. तुझ जैसे निकम्मे के हाथ कहाँ लग गयी ये सोने की चीज़?"

कोई मुझे बोलने क्यूँ नहीं दे रहा था? काफी ख़ुशी हो रही थी की फूलवाला मेरी तारीफ़ कर रहा था... मेरा मतलब है, ईशान के पापा मेरी तारीफ कर रहे थे. ईशान स्कूटी पर बैठे-बैठे मुस्कुरा रहा था. उसने ज़मीन से गजरा उठाया, वापिस अख़बार में लपेटा मगर अपने ही हाथ में रखे रहा.

"अरे, मैं दूसरे गेट पर इंतजार कर रहा था इस महाशय का." ईशान ने मेरी तरफ देखते हुए कहा. "अब कैंपस के 7 गेट हैं. हर गेट पर तलाश करके आ रहा हूँ इनकी."

मुझसे रहा नहीं गया, "कुछ भी! हमारी कल से बात हुई है की मेन गेट पर मिलना है."

"आप भूल चुके हैं की कैंपस के दो मेन गेट हैं. एक स्टाफ़ के लिए और एक बच्चों के लिए." मैंने ये सुना, सोचा, सोचा, सोचा और स्तब्ध खड़ा रहा, "ओह!"

"और हम आपके फ़ोन पर घंटियाँ बजाये जा रहे हैं मगर प्रभु हमरी पुकार नहीं सुनत हैं." मैं शर्म से लाल हो चुका था. मैं भी क्या-क्या सोच चुका था. ईशान अब भी स्कूटी पर बैठा था और मेरी तरफ़ ही देख रहा था. कुछ कहने लायक तो मैं बचा था नहीं. पर जो बचा खुचा था बोलने को, वो सब ख़त्म हो चुका था उसके पापा के सामने. कहाँ मैं सपने संजो रहा था कि फूलवाले को पता चल जाये की मैं गे हूँ और कहाँ अब वहां खड़े होने से भी कतरा रहा था. ईशान मुझसे बहुत बेहतर बातें कर रहा था और लाज बचाए हुए था हम दोनों की. मैं वहां खड़ा था की किसी तरह हम दोनों वहां से चल दें. पर ईशान का ऐसा कोई इरादा नहीं था.

आखिर उसने मुझे अपने पास बुलाया. मैं जब नहीं हिला तो उसने स्कूटी चला दी और मेरे बहुत पास आकर मेरे गाल पर एक छोटी सी पप्पी दी. ये क्या था! मैं से लाल हुआ या शर्म से, ये सोचने का समय नहीं था मेरे पास. मैंने भयभीत होकर उसको देखा, फिर फूलवाले को. फूलवाला कुछ नहीं बोला. बस हमें अजीब-सी नज़रों से देखता रहा. मुझे याद आया कि वो मुझे जानता है.

"यहाँ..? सॉरी अंकल!... तुम... चले जाओ... ", कुछ शब्द फूटने के बाद मैं लाज के मारे कैंपस की ओर चल दिया. अभी मैं फूलवाले से कुछ ही दूर गया होंगा की ईशान भी मेरे पीछे-पीछे स्कूटी लेकर चल दिया.

"अरे चलो, अल्ताव! तुम ऐसे क्यूँ जा रहे हो?"

ये आदमी था या पजामा? क्या इसने अभी-अभी वही किया जो मैं अपने सपने में भी नहीं सोच सकता था? पर... पर अगर उसने अपने पापा के सामने मुझे किस किया तो उसके पापा को भी पता ही होगा. मैं रुक गया. हाँ सही बात तो है, मुझे क्या फर्क पड़ता है. अच्छा ही नहीं है की उसके पापा को पता है की वो गे है? मैं ईशान की स्कूटी की तरफ़ मुड़ा और चुप-चाप जाकर पीछे खाली सीट पर बैठ गया. ईशान ने स्कूटी चला दी.

मौसम दिन-भर की धूप के बाद अभी ही ठंडा हुआ था. स्कूटी में हवा खाते हुए हम चुपचाप चले जा रहे थे. मेरा एक हाथ उसके कंधे पर था और दूसरा उसकी कमर में. मैं ना ही जानता था की हम कहाँ जा रहा थे और ना ही जानना चाहता था. ईशान ने स्कूटी नहर के किनारे रोक दी. तब पता चला कि ईशान ने हमें घाट से थोड़ी दूर पर लाकर खड़ा कर दिया था, घाट पर बहुत भीड़ होती है ना. मुझसे रहा नहीं गया.

चाँदनी में ईशान का बदन बहुत ही छरहरा लग रहा था. उसके मुँह पर अब भी एक मंद-मंद मुस्कान थी जो जा ही नहीं रही थी. क्या ये मुस्कान मेरे लिए थी? सोचते ही रौंगटे खड़े हो गए. हम करीब आ गए.

मैं कान में फुसफुसाया: "घर जाकर क्या जवाब दोगे? अपने पापा के सामने मुझे किस क्यूँ किया?"

एक दम से उसने मुझे झटक दिया. "तुमने कहाँ देख लिया उन्हें!" उसकी आँखें डर गयी थीं. ये क्या हुआ?

"वहीँ पर तो थे वो." मैंने क्या समझ लिया था? एक मिनट... "फूलवाले भैया ही तुम्हारे पापा हैं ना?"

वो वहीँ खड़ा रहा. और दो सेकंड बाद ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा. "हाहा! मैं कहाँ से उनका बेटा लगता हूँ? तुम्हें पता है ना मेरे पापा कौन हैं? "

"कौन?" मुझे बेवकूफ़ाना प्रतीत हो रहा था.

"मेरा नाम ईशान जोशी है. तुम्हारे डिप्टी डायरेक्टर प्रोफेसर जोशी की दुकलौती संतान."

अब जाकर मुझे पूरा मामला समझ आया. मैंने ईशान का हाथ अपने हाथ में लिया और नहर की तरफ चल दिया: "चलो अच्छा ही है, अभी दामाद बनने के लिए मैं तैयार भी नहीं हुआ हूँ."

ईशान ने भी कलकल बहते शोर में अपनी चाशनी-सी हँसी घोल दी.

अनुराग कालिया

अनुराग आई आई टी रूरकी से MCA की पढाई कर रहे हैं और इनका दिल्ली व् रूरकी के बीच आना जाना रहता है| ये स्त्रीवाद एवं क्वीयर अधिकारों में विश्वास रखते हैं|