माँ को ख़त

--
नीचे दिए गए पत्र को आई. आई. टी. खड़गपुर के एक बीस वर्षीय विद्यार्थी ने लिखा है| अपने को और अपनी पहचान को जानने-समझने का हाल ही में उन्होंने सफ़र शुरू किया है | हालाँकि वो गुमनाम रहना चाहते हैं मगर इसलिए नहीं कि उन्हें अपनी लैंगिकता से शर्मिंदगी है, पर इसलिए कि उनके भीतर कुछ द्वंद्व हैं और कुछ सवाल हैं जिनको को सबसे पहले सुलझाना चाहते हैं|
--
प्यारी माँ,

तुम मेरी ज़िन्दगी में सबसे ख़ास रही हो, मेरी दोस्त और साथी रही हो, और मैं तुमसे कितना ज्यादा प्यार करता हूँ| क्योंकि तुम मेरे इतने पास हो इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे अच्छे से जानो| माँ, मुझे नहीं पता कि कब मैं इस ख़त को तुमको दे पाउँगा मगर यह १० अक्टूबर, २०१४ को लिखा गया है|

माँ, मैं गे हूँ, इसका मतलब मुझे लड़के पसंद हैं नाकि लड़कियाँ |

प्लीज़ थोड़ी शांति से आगे पढ़ो, और चिंता मत करो| मैं वहीँ छोटा सा तुम्हारा बच्चा हूँ, बस तुमको मेरे बारे में और थोड़ी सी जानकारी मिल गयी है| कुछ बदला नहीं हैं माँ| शायद तुम आज मुझसे नाराज़ या फिर निराश होगी मगर मैंने अपनी लैंगिकता को कभी चूज़ नहीं किया। ये अधिकार मेरा कहाँ था! जैसे किसी की नीली आँखें होती हैं या फिर कोई बाएं हाँथ से लिखता है वैसे ही मेरा प्रेम रिझाव लड़कों की तरफ था माँ | और जहाँ तक मुझे पता है इसे बदला नहीं जा सकता।

पता है दुनिया में तुम ही मेरे लिए सबसे ज़्यादा मायने रखती हो, और आज तक तुमसे ये चीज़ छुपाना मेरे लिए कितना मुश्किल रहा है। मैं बस यहीं चाहता हूँ कि तुम मुझे जान सको और बेहतर ढंग से समझो| औरों के विचारों से मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता मगर तुम्हारे जज़बातों से पड़ता है माँ। अगर मेरे चाहने वालों ने मुझे, मैं जो कुछ भी हूँ उसके लिए, स्वीकार किया तो मुझे और कुछ नहीं चाहिए।

मुझे पता है कि कुछ लोगों को इससे प्रॉब्लम होगी और शायद वो मुझे पसंद ना करें, स्वीकार न करें-मगर मुझे नहीं लगता कि मेरी लैंगिकता से मुझे शर्मिंदा होना चाहिए| मैं जैसा हूँ मुझे वैसे रहने में ही ख़ुशी मिलेगी, खुद को बदलने की कोशिश में नहीं| कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि तुम सब कुछ जानती हो माँ! फिर भी आखिर ये बातें अनकही सी क्यूँ हैं?

किशोरावस्था में आने के बाद से ही मुझे मालूम था कि मैं औरों से अलग हूँ| दुसरे लड़कों के मुकाबले मेरी पसंद कुछ चीज़ों में अलग थी| जब उनको लड़कियों में आकर्षण हो रहा था उस दौरान मुझे अपने हमउम्री लड़कों में दिल्चस्बी थी| पहले-पहले ऐसा लगा कि शायद यह एक अवस्था है फेज़ है जोकि उम्र के साथ चला जाएगा| मगर जल्दी ही मुझे ये समझ आ गया कि यह एक फेज़ नहीं बल्कि मेरी पहचान और मेरे अस्तित्व का एक बड़ा हिस्सा है| बहुत डर लगता था तब| ऐसा लगता था जैसे कुछ गलत हो रहा हो मेरे साथ| खुद को कोसता था कि ये आखिर मेरे साथ ही क्यों हुआ| लगता था मानो सब मुझसे नफ़रत करेंगे क्योंकि मैं अलग हूँ, क्योंकि मैं सबके जैसा नहीं हूँ|

सोंचो एक १२ साल के बच्चे में ये सब जानने समझने की कुव्वत कैसे होगी भला| तभी से मैंने इसको अपने भीतर दबाया हुआ एक राज़ बनाकर अपने होठों को बंद कर दिया| धीरे-धीरे इसने भीतर से मुझे खा-खा कर खोखला कर दिया है| मुझे ही नहीं किन्तु मेरे तुम्हारे रिश्ते को भी| मैं बिलकुल नहीं चाहता हूँ कि ऐसा हो| मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे जानो, अपने बेटे के तौर पे, जोकि सिर्फ आई. आई. टी. में ही नहीं पढता मगर जिसकी अपनी मनोस्थिति है, परेशानियाँ हैं, असुरक्षाएं हैं और जिसने अपनी माँ में हमेशा एक अटूट आश्रय पाया है| तुम्हारे साथ मैं बहुत सेफ महसूस करता हूँ, लगता है कि डरने की ज़रूरत नहीं है|


पता नहीं तुम मेरे बारे में अब क्या सोंच रही हो| तुमको ये ख़त लिखना शायद मेरी ज़िन्दगी में अभी तक का सबसे मुश्किल समय रहा है| तुम्हे निराश करने का डर मुझे बहुत सता रहा है| मुझे माफ़ कर देना अगर मेरी बातें तुम्हें चोट दे रही हैं मगर मुझे मेरी ज़िन्दगी अब अधेरे में नहीं बितानी| मुझे एक ऐसी खुली और खुशहाल ज़िन्दगी चाहिए जिसमे मेरे चाहने वालों को मेरी सच्चाई पता हो, जो जाने कि मुझे अपनी ज़िन्दगी कैसे बितानी है नाकि कैसे समाज चाहता है कि मैं ज़िन्दगी बिताऊं|
एक और बात ज़रूर याद रखना कि कुछ भी हो जाए तुम्हारे लिए मेरा प्यार कभी कम नहीं होगा और इस ख़त से मैं बस तुम्हारे कुछ और करीब आना चाहता हूँ - अपने सच्चे रूप में|

http://www.bottomlinepublications.com/content/article/home-a-family/what-to-say-if-your-child-is-gay

ऊपर दिया आर्टिकल, समलैंगिकता के कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालता है| कुछ सर्वेक्षणों के मुताबिक करीबन १० प्रतिशत लोगों में समलैंगिक प्रवृत्ति होती है| इसका ये मतलब है कि हर १० में से एक व्यक्ति समलैंगिक है मगर उनमे इतनी शक्ति और सहस नहीं होता कि समाज से विरुद्ध जाके अपनी लैंगिकता के बारे में खुल के आ सकें| समझ भी सकता हूँ इसका कारण- आखिर क्यों कोई बेमतलब के गली गलौज सुनना चाहेगा| सोंचता हूँ कि अगर ऐसा नहीं होता तो कैसा होता| शायद मेरा बचपन इतना डरे हुए नहीं बीतता!

माँ, एक और बात- मेरी लैंगिकता तुम्हारी या बाबा के गलत परवरिश के कारण नहीं हुआ है| मैं जैसा इंसान हूँ और मुझमें जो गुण हैं वो मेरी इंसानियत को परिभाषित करते हैं- मेरी लैंगिकता नहीं| तुम्हारी ही परवरिश ने मुझे इतनी शक्ति दी है कि आज मैं जो हूँ वो तुम्हें और अपने चाहने वालों को खुल के बता रहा हूँ| तुम्हीं सोंचों कि अगर कोई इसको बदल सकता तो क्यों ही कोई अपने आप को समाज के हाशिये पे रखना चाहेगा|

माँ तुम शायद सोंच रही होगी कि ये मेरे सारे पश्चात या नास्तिक विचारों के कारण हुआ है, मगर ऐसा नहीं है। मैं जैसा हूँ वैसा होने में मुझे किसी ने प्रेरित नहीं किया है। मैं हमेशा से ऐसा ही था।

प्लीज़ मुझसे एक बार बात करो, मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत है। प्लीज़ मुझसे नफरत मत करना माँ वर्ना मैं टूट जाऊंगा| पता नहीं कब मैं इस खत को तुम्हें दे पाउँगा मगर तुमसे ये सब छुपके हर बार मैं हज़ार मौत मरता हूँ |

तुम्हारा प्यारा
अरमान

माँ का जवाब यहाँ पढ़ें !

अरमान/मि. आर्किटेक्ट

दिए गए पत्र को आई. आई. टी. खड़गपुर के बीस वर्षीय विद्यार्थी ने लिखा है| अपने को और अपनी पहचान को जानने-समझने का हाल ही में उन्होंने सफ़र शुरू किया है | हालाँकि वो गुमनाम रहना चाहते हैं मगर इसलिए नहीं कि उन्हें अपनी लैंगिकता से शर्मिंदगी है, पर इसलिए कि उनके भीतर कुछ द्वंद्व हैं और कुछ सवाल हैं जिनको को सबसे पहले सुलझाना चाहते हैं|