बेताल्लुक को प्यास का वरदान

धनंजय वैद्य का खुल जाने का यह सफर करीबन पाँच साल का था - पहिले अपने आप, फिर सहयोगियों के साथ, फिर परिवार के साथ। हर जंजीर टूटने से वह ज़िंदगी के बाकी पहलू जीने के लिये आज़ाद होता गया । अपने साथी ब्रायन के साथ सादा घरेलू जीवन भी पाया, और अपने पेशे में जी लगाकर बढ़्ने के लिये भी वह मुक्त हो गया । बाल्टिमोर, मेरीलैंड, यूएस, में वह आयुर्विज्ञान में अनुसंधान करता है । वह आपके अपने हर सफर के लिये शुभकामनाएं देता है ।

कल्पना करो - बेहद गर्म दोपहर, तुम अकेले चले चल रहे हो । वैसे ठीक-ठाक महसूस कर रहे हो । जब घर पहुँचकर पानी का घूँट मिले, पता चलता है कि घंटों तरस रहे थे । कुछ ऐसा ही बड़ा अहसास मुझे पच्चीस साल की उम्र में हुआ ।
बड़े होने का मेरा अनुभव साधारण ही था - इम्तिहान, कालेज, नये मज़े, नयी जिम्मेदारियाँ । पर कुछ तो अलग था । दोस्त आधी रात गये गप्पे हाकते, उनके साथ मैं था भी, न भी था । बात मुड़मुड़कर वहीं आती - मन लुभाने वाली, तन मचलाने वाली लड़कियाँ! पर मैं पूरी तरह से शरीक नहीं होता था । शरीरविज्ञान की सूचना थी मुझे । मेरा तन भी उत्तेजित होता था, रात में भीगा-भीगा मैं भी जागता था । पर लड़कियों से मचला नहीं कभी मेरा मन । दोस्तों की बातें मुझे बस हवस की नौटंकी लगती थीं । कुछ दोस्त मुझे "बैरागी", कुछ मुझे "ढोंगी" कहकर चिढ़ाते थे । बातें दोनों गलत थीं - न मुझमें था वैराग्य, न थी छुपाई आशिकी ।

फिज़ूलके गप्पे छोड़ो, कालिदास के भावुक काव्य भी मुझे बढ़े चढ़ाए काव्यालंकार नज़र आते थे । कवि मेरे मन की बात बेहतर कह रहा है, ऐसे मैं कभी पुलकित न हुआ । यूँ कहो, लैंगिक भावों का विश्व में मैं अजनबी था । विडंबना ऐसी,कि मैं अपनी वंचना से भी अनजान था । या कहो, कि मेरे होश में अनजान था । अमूर्त तूफान सपनों में उठते, और सपनों ही में थककर मिटते थे ।

मैं पच्चीस साल का था, जब एक दिन मैं विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में गया । बस ऐसे ही नज़र आयी, तो मैंने दिलचस्पी से उठा ली एक किताब - "समलैंगिकता" । कुछ वस्तुवादी, कुछ नीरस थी उसकी शैली । लेकिन अलग बात यह, कि किताब शरीर नहीं, बल्कि जज़्बात के बारे में थी । पन्ने पलटने लगा तो मेरे रोंगटे खड़े हुए । "यह मेरी जीवनी लिखी है!" किताब अमरीकी वाचकों के लिए लिखी थी - धर्म, संस्कृति, समाज, किसी ब्योरे का मुझसे ताल्लुक नहीं था । फिर भी मैं जैसे कि अँतडी से बंधा था । मेरी नींद जैसे उसी क्षण खुली थी - यही "मैं" हूँ । यह कोई कड़ी-कड़ी जोड़े बनाया तर्क नहीं था । मेरे अंदर बन रहा यह यह वास्तवदर्शन पूरा और नि:संदेह प्रकट हुआ था । किताब निमित्तमात्र थी, नींद आज न खुलती तो कल खुलती ।

"यह क्यों हुआ" इसका मुझे ताज्जुब नहीं हुवा, बल्कि सवाल यह था कि “इतनी देर क्यों हुई"? बड़े होते हुए भी मेरा तन उत्तेजित करनेवाले लड़के ही थे, यह साफ़ याद आया । रात में मुझे गीले करने वाले सपने भी लड़कों के ही थे, यह भी साफ़ याद आया । यादें गढ़ी हुई थीं, उखड़ी हुई नहीं । नया पौधा अभी दिख रहा था, लेकीन बीज बरसों से तैयार था ।
उस क्षण मेरे मन में एक कक्ष पर लगा ताला खुल गया । उसके झरोकों से मैंने नया दृष्टिकोण पाया । मेरे युवा दोस्त लड़कियों के बारे में पागल हुआ करते थे, उनका उनका बरताव मुझे कुदरती नज़र आया । एक समानांतर कामना उस कक्ष में मैंने अपने में पायी । इस झरोके में से मैंने स्वच्छ देखा, कालिदास का काव्य सच्चा है, दिखावटी अदाकारी नहीं ।
प्रेम, कामना, रति, सब के लिए हृदय में अब ठिकाना पाया था । इनके लिए मैं व्याकुल हूँ, यह मैं भलीभाँती समझा । बेशक, प्यास पता चलने में शांति नहीं है, वह तो पानी पीने में है । यह अहम जरूरत अब जान गया तो इसे हासिल करने की कोशिश मैं करूँगा, और इन्शाल्ला कामयाब हो जाऊँगा, यह आशा मुझे मिल गयी । और इस आशा के तोलमोल की कोई भी उपलब्धि नहीं हो सकती ।

धनंजय वैद्य

धनंजय वैद्य का खुल जाने का यह सफर करीबन पाँच साल का था - पहिले अपने आप, फिर सहयोगियों के साथ, फिर परिवार के साथ । हर जंजीर टूटने से वह ज़िंदगी के बाकी पहलू जीने के लिये आज़ाद होता गया । अपने साथी ब्रायन के साथ सादा घरेलू जीवन भी पाया, और अपने पेशे में जी लगाकर बढ़्ने के लिये भी वह मुक्त हो गया । बाल्टिमोर, मेरीलैंड, यूएस, में वह आयुर्विज्ञान में अनुसंधान करता है । वह आपके अपने हर सफर के लिये शुभकामनाएं देता है ।