हे हेल्लो!

आई ऐम साराह (उर्फ़ फ़िदा) लीविंग इन मुंबई,सांताक्रुज (मेरा नाम साराह उर्फ़ फ़िदा है और मैं मुंबई में सान्ताक्रुज़ की निवासी हूँ)। मैं यहाँ अपने घरवालों के साथ रहती हूँ और यह बिलकुल आसान नहीं था। आइये मिलते है फ़िदा से - यानी मुझसे - और जानते है कि ज़िन्दगी जीना कितना भी मुश्किल हो, इंसान को सासें लेना अच्छा ही लगता है।

मेरी कहानी भी वैसे ही शुरू होती है जैसे सबकी होती है। पैदा होने पर सबकी लाइफ कहाँ नहीं बन जाती? मेरी भी ऐसी कहानी बन गयी जोकि देखते ही देखते आज दिल से कागज पर आ गयी। शुरुवात हुई उस दिन से जिस दिन समझ में आया कि आइने में जो दिखता है, वो मेरी सच्ची पहचान नहीं है| मुझे आईने में एक लड़की देखनी थी और ऐसा नहीं था। उस दिन मुझे ऐसा लगा कि मैं तो गलत शरीर मैं पैदा हो गयी| बचपन में मगर इतना ध्यान नहीं दिया क्यूंकि कोई जानना ही नहीं चाहता था कि मेरे साथ प्रॉब्लम क्या है। इसके बाद बारी आई उस उम्र की जिसमे हमें खिलौने अच्छे लगते हैं मगर मुझे जो खिलौने अच्छे लगते थें उनसे तो जैसे खेलने के लिए मैं पैदा ही नहीं हुई थी| वो खिलौना था 'गुड़िया' । मैं जब पहली बार मम्मी से गुड़िया लाने बोली तो उन्होंने मुझे बड़ी ख़ुशी से लाकर दिया मगर वही बात दोबारा कहने पर मुझे सख्ती से मना कर दिया | उन्होंने कहा कि गुड़िया मेरे लिए नहीं है। मैंने भी जैसे समझौता कर लिया यह सोचकर कि क्योंकि सब लड़कियां गुड़ियों से खेलती हैं इसलिए माँ मना कर रही हैं|

ऐसा है ना कि जब तक हम माँ की पेट मैं रहते है हम मेहफ़ूज़ होते हैं और बाहर आने पे हमें इस दुनिया का सामना करना पड़ता है और यह बात मुझे बहुत डरा देती थी। मुझे लगता था कि मैं अकेली हूँ इस प्रॉब्लम के साथ| फिर पता चला कि मैं अकेली नहीं हूँ | सब कुछ में दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चलना पड़ता है। यह बात मुझे बहुत परेशान करती थी कि “बाहर निकलने पर किसी ने कुछ कह दिया तो क्या होगा?” “किसी ने सुन लिया तो किसी को बोल देगा!” मैं खुद को समझाती थी कि कोई कुछ भी कहे मुझे फर्क नहीं पड़ना चाहिए | ऐसा भरोसा रख कर भी हर एक भी बात सुनकर बहुत तकलीफ होती थी | बहुत कोशिश करने पर भी कोई फायदा नहीं होता था|

फिर भी वक़्त हमें आखिर आगे ले ही आता है। देखते देखते मैं स्कूल पहुंची| इस दौरान मेरी प्रोब्लेम्स इतनी बढ़ गयी थी कि लोग मेरी रोज़ खुदखुशी देखते थे | जब कोई मुझे ऐसे ही बिना मतलब, मेरी पर्सनालिटी पर, कुछ तीखे शब्द इस्तमाल करता था तो यह बहुत निराशाजनक होता था। मैं खुदको मज़लूम मानती थी जो चल-फिर तो सकती है पर कुछ बोल नहीं सकती और अगर बोले भी तो ताकत कहाँ से लाय लड़ने की? देखते ही देखते मेरे स्टडीज भी ख़त्म हो गए और मैं भी अब वह सीधी साधी चुपचाप सुनकर कुछ ना कहते हुए आगे निकल जाने वालो में से नहीं थी| मैं बदल चुकी थी और यह बदलाव मुझे बदलने के लिए नहीं मगर बाहरी दुनिया को बदलने के लिया था।

अब धीरे-धीरे मैं ऐसे लोगों से मिलने लगी जो मेरी ही तरह सोचते थे, और मेरी ही तरह दिखना चाहते थे| मेरी तरह सोच रखने वाले लोगों से मिलकर तो जैसे मानो पाओं ज़मीन पर नहीं टिके थे, मैं ख़ुशी के मारे आसमान में जा चुकी थी| यह मेरी दुनिया थी और इस दुनिया का नाम था 'हमसफ़र' ट्रस्ट, जोकि हम जैसों के लिए काम करने वाली एक और्गेनाइजेशन है ।

हमसफ़र ने मेरे “मैं" को “हम” में बदल दिया और मानो सारे ग़म ले लिए। लेकिन कहते हैं ना कि सुख सिर्फ चार दिन का होता है| मेरे हमसफ़र जाने की बात मेरे फैमिली को पता चल गयी जिससे घरवाले बहुत नाराज़ हुए और मुझे काफी मारा भी। अब मुझे समझ में आने लगा था कि हम जैसे लोगों को समाज में कोई इज्जत नहीं देता इसलिए मुझे वहाँ नहीं जाने दिया जा रहा था। मेरे घर में मुझे लेकर रोज़ झगडे होने लगे| कभी “ऐसा क्यों चलता है”, कभी “ऐसा क्यों बोलता है” इन सभी चीज़ों पे मुझे लोग बहुत कुछ बोलने लगें| मगर किसी ने भी खुदसे नहीं पूछा कि मेरी प्रॉब्लम क्या थी। यही सब में बड़ी मुश्किल से वक़्त गुज़र रहा था| अभी मैंने मेरे लिए दुनिया ढूंढ ली थी मगर घर वाले कहते थे कि वे मुझे मार देंगे पर हमसफ़र जाने नहीं देंगे।

एक दिन मेरी एक फ्रेंड ने मुझे पिक्चर चलने को कहा। मैं तैयार होकर निकली तो देखा कि गेट पे ताला लगा है| पीछे मुड़ी तो अंकल के हाथ में रोड देखकर मेरे पसीने छूठ गए। और उन्होंने मुझे बहुत मारा| मेरे हाथ फ्रैक्चर कर दिया, टाँगे तोड़ दी, और चेहरा बिगाड़ दिया| सिर्फ मेरे बहार जाने कि तमन्ना की वजह से|

इस हादसे के बाद मेरे अंदर की भावनाएं और मज़बूत हो गयीं| मैं इनकी मक्कारी की हद को जान चुकी थी और जैसे ही मैं ठीक हुई मैं सबसे पहले अपने लोगों में गयी। अब मेरे अपने लोग हिजड़े थे। जब मैं वहां गयी तो पता चला कि मुझे हिजड़ा कहला कर उनके यहाँ रहना होगा| इसके बाद मैंने घर छोड़ दिया और निकल गयी उन लोगों के पास जिनकी तरह मैं बनाना चाहती थी|

मेरी चाहत मुझे 'गोआ ' लेकर गयी जहाँ वक़्त ने फीर एक बार मुझे मात दे दिया। मेरे अपने लोग जिसे मैं सिर्फ दुनिया में मेरी तरह कहती थी वह लोग भी मतलब परस्थ निकले उन्होंने भी मुझे पिटना और गाली देना शुरू कर दिया| एक दिन तो हद ही हो गयी! उन्होंने मेरे बाल काट दिये गए और मुझे फिरसे पहले की तरह बना दिया गया।

वापस आने के लिए सिवाए फैमिली के कोई नहीं था और फैमिली से आलरेडी बहुत झगड़ा हो चूका था| फिर भी गाय के सिंह गाय पे थोड़ी ना भारी होते हैं| मैंने माँ को आवाज़ दिया- "माँ", और उसने मुझे गले लगा लिया। मेरे ज़ख्मों पर मलहम लगाया और होसला दिया गिर कर उठने का। मैं फिर घर पर रही मम्मी के पास। फिर बाल बढ़ाये और घर वालों को यह अछा नहीं लगता था तो मैं अपने फ्रेंड के यहाँ चली गयी रहने। उसने भी थोड़े दिन प्यार किया फिर तो आपको पता है चीज़ें पुरानी होने पर क्या होता है। और देखते ही देखते मेरी फ्रेंड ने मुझे जाने के लिए कह दिया। अब कहाँ जाती? पूरी दुनिया छोटी लग रही थी तो दिल में ख्याल आया कि ज़िन्दगी ही इतनी तकलीफ देती है तो मौत को तो लोग यूहीं क्यों बदनाम करते हैं? मैंने सोचा यह दरबदर ठोकरें खाने से अच्छा है कि मैं मौत को ही चख लूं। मरने से पहले मेरे दिल में ख्याल आया कि क्यूँ ना जन्म देने वाली से मिल लिया जाए एक बार मरने से पहले। मैं घर पहुंची| जैसे ही मैं सलाम करकर अंदर घुसी मम्मी सलाम का जवाब देते हुए कहने लगीं "तुम्हारे अंकल ने तुम्हें रहने के लिए एक फ्लैट खरीदकर दिया है|” मानो मेरे पैर के नीचे से ज़मीन ही निकल गयी। यह सोचकर कि मैं जिस चीज़ के लिए मरने जा रही थी वही चीज़ मेरे जीने की उम्मीद बन गयी| मेरा छत और मेरा अपना घर।

अब घर अपना था तो फैसले भी अपने ही थे। मैंने फैसला कर लिया था की मैं वही इमेज बनाउंगी जो मैं बचपन से आईने में देखती आ रही थी। और आज मैं वही इमेज के साथ अपनी फैमिली में हूँ। फील्स प्राउड कि आई ऐम द पर्सन हु हैज़ कम आउट विथ फ्लाइंग कलर्स ओन कंडीशन्स व्हिच वर लाइक नेवर एवर एक्सेपप्टेबल (मुझे फक्र है कि मैंने अपनी पहचान को उन शर्तों पे अपनाया है जिनको कभी किसी ने स्वीकार नहीं किया)|

Fida