मैं और तुम

मैं
समंदर की गहराइयों से निकल कर
लहरों से जूझ
सूरज की किरणों की छुअन पाकर
हवा में घुली
हवा के थपेड़ों के बीच
अपने जज़्बे की गर्मी पे सवार
आसमां की ओर बढ़ी
अपने जैसी अनगिनत औरों से मिली
झुंड बना हम
बादल की शक्ल में आगे बहे
कभी हवा से छितराये
कहीं बरस ही न पाये
हज़ारों मीलों का फासला तय कर
तुम्हारे शहर के आसमां पे छाए
गड़गड़ाए
फिर देखा मौका, मूंदी आँख
और लगाई छलाँग
और फ़िर एक बार
हवाओं के संग लड़ते, नाचते
गिरी
तुम्हारी ओर, तुम्हें भिगोने
और तुमने
बड़े ही आराम और बेशरमी के साथ
अपना छाता खोल लिया.

हर्ष