सफर

ना भुला ना बिसरा,
ऐसी है ये कहानी
कैसे इसे मैं भूलता
कुछ ख़ास ये बात पुरानी।

रंग-बिरंगा दिन होने वाला था, पर रात की घटा अभी तक हटी नहीं थी। पिछली रात सोने से पहले का नज़ारा याद है मुझे, तोफ़ा-ए-मिज़ाज मुझे सुझा था, इसलिए उसे होली की शुभकामनाएं देने हेतु तोफ़ा दिया था मैंने| वही कुछ छोटी चीज़े थीं जिन पर से मैं आशा लगाए रखता कि उसे मेरे जस्बातों की क़दर हो जाए।

जज़्बात जो मुझमे जाग उठे थे, जिनकी खबर उसे नहीं थी, जिसे फिर भी उससे बाँटना चाहता था, उसके मन में जज़्बातों को जगाना चाहता था, उसे अपना बनाने के लिए ज़िन्दगी की हर मुश्किलों से गुज़रने को भी तैयार था, पर कहते हैं ना कि एक हाथ से ताली नहीं बजती! वैसे ही कुछ मेरे साथ हुआ था। प्यार सिर्फ मुझे था उससे, उसकी चाहत तो मेरे लिए दोस्ती तक ही सीमित थी, और मैं बहुत आगे बढ़ चुका था।

अधूरी सुबह हुई और हम तैयार थे सफ़रतय करने के लिए। निकलने से पहले जो पल हमारे बीच बीते थे, वो, वैसे ही पल फिर मेरे ज़िन्दगी में आयें, इसकी आरज़ू करता हुँ। उन पलों के कारण थोड़े वक़्त के लिए ही क्यों न सही, मैं यह मान बैठा था कि हम हमेशा साथ ही थे, साथ ही हैं, और साथ ही रहेंगे।

***

"यहाँ ब्रश करना है?" मैंने वॉश-बेसिन की ओर देखते हुए पूछा।

"हाँ!, नहीं तो कहाँ करेगा फिर?” कहा उसने। उसके कहने से मालुम हो रहा था यदि ब्रश करना है तो वहीं करना पड़ेगा, वरना दिन भर बासी मु लेकर घूमना पड़ेगा।

वॉश-बेसिन में ब्रश भी करते हैं ये मुझे उस दिन पता चला। उस वक़्त जिस प्रकार उसने मुझे सिखाया था ब्रश करना वो मेरे दिमाग के एक हिस्से में अभी भी कैद है और ताज़ा है।

"देख हाथ में ब्रश ले!" मेरा हाथ पकड़ कर उसने मुझसे कहा।

"पागल मैं जानता हुँ ब्रश करना, बस वॉश-बेसिन में कभी नहीं किया है।"

"अच्छा ठीक है, मैं करता हुँ वैसे मुझे देख तू कर” दिलासा देते हुए उसने मुझसे कहा।

हमने ब्रश किया और मुझे फेस साफ़ करना था जिसे मुझे करने में शर्म आ रही थी।उस वक़्त उसने ज्यादा न सोचते हुए मेरे पीछे आकर, एक हाथ कमर पे और दूसरा मेरे कंधे पे रख उसने मुझे झुकाया और समझाने लगा कि मुँह कैसे धोते हैं।भले ही छोटी सी चीज़ थी वो, पर इसमे मुझे उसके छुअन की आस भा-गई थी।

"चल अब चाय पीकर निकलना है।" मेरा हाथ पकड़ कर और घड़ी की ओर इशारा करते हुए वो मुझे किचन में ले गया।

"ये क्या सिर्फ एक बिस्किट खाएगा क्या? बड़े दूर जाना है, पता है ना?”

"हाँ तो!?” कहकर उसने वही बिस्कुट आधा मुझे खिलाने के विर से उसके दो टुकड़े किये और बोला,
"ले आधा तेरे लिए, आधा मेरे लिए, वैसे भी हम साथ ही है ना दिन भर, तो मेरे लिए एक दूसरे का साथ बहुत है पेट भरने के लिए ओर दिन बिताने के लिए।"

मैं जानता था कि यह सारी बातें बस कहने और सुनने में अच्छे लगती हैं, पर फिर भी उसके विचारों ने मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया - "क्या वो मेरे लिए भी वही जस्बात रखता है, जिस प्रकार मैं रखता हुँ उसके लिए?"

"हाँ! हाँ! बोल तो ऐसे रहा है जैसे अपने दोनों के लिए एक घर लेकर रखने वाला है तू, वहाँ हमें बस एक दूसरे के साथ रहना है और पेट भरना है, और वैसे भी जिंदगी युहीं बितनी वाली है, तू तैयार है मेरे साथ रहने के लिए ज़िन्दगी भर एक ही घर में हमेशा के लिए?" मेने नाक चढ़ाते हुए उसे चिढाया।

"मै वो सफ़ेद टी-शर्ट पहनुँगा जो तूने इस जन्मदिन पर गिफ्ट किया था, अंदर के रूम में है जरा ले आना।"

"आह! ले तेरे टी-शर्ट के चक्कर में चटका लग गया ज़बान पर”, चाय फुकते मैंने उससे कहा।

"पागल! रुक मैं ठंडा कर दू, यहाँ दे!" उसेने चाय का प्याला मेरे हाथ से लिया और उसे फुकने लगा।

"क्यों जी, आज बड़ा प्यार आ रहा है मुझ पर?"

"तू मेरे लिए इतना कुछ करता है और मैं तेरे लिए थोड़ा भी नहीं कर सकता क्या?"

"और जब मैं करना बंद कर दूँ तो?"

"तो क्या? मेरा प्यार भी बंद!"

"क्या?"

"मजाक कर रहा हूँ बाबा!"

भले मेरे चंद कोशिशों पर वो अपनी रहमत बरसाता था, वह ही उस समय के लिए काफी था मेरे लिए।
मन तो हमेशा आकाल की स्थिति कि तरह बंजर रहता था अगर उसकी थोड़ी आवाज़ भी ना सुनूँ या उसकी एक झलक भी न देखूं तो। दिल हमेशा इन्ही कोशिशों में जुटा रहता था कि कहीं न कहीं, किसी भी बहाने उसकी आवाज़ सुन लूँ या उसे एक बार देख लूँ। कई बार इन कोशिशों में सफल भी हुआ और इस सफलता पर पेट भर उसकी डाट भी खायी। (जिसमे भी मुझे ख़ुशी मिलती थी।)

***

घर से हम निकल चुके थे। बाहर अँधेरे ने मानो सारे जहाँ को अभी तक ढक रखा था। जिस अँधेरे ने मुझे हमेशा डराया था, तब उसी अँधेरे में, उसका मेरे साथ होने के कारण, मुझे कदम से कदम बिना झिझके आगे बढ़ाने का धैर्य मिला था। कच्चे रास्तों पर भी मेरे कदम सही पड़ रहे थे। उसका साथ होने में एक ऐसा जादू था जिससे मुझे उसके अलावा किसी और की जरुरत नहीं पड़ती थी। हमेशा ही उसके प्यार ने मुझे कुछ न कुछ दिया था, कभी ज़िन्दगी से लड़ने का होंसला, तो कभी अकेले खड़े होने का जज़्बा। पर प्यार नहीं।

हम दादर स्टेशन पहुँचने ही वाले थे तब उसने कहा- "मुझे नींद आ रही है", वो भी इतनी कोमलता, प्यार भरी मधुर आवाज़ में उसने मुझे कहा जैसे कोई बच्चा सुबह स्कूल जाने से पहले बहाना बनाता हो।

"पागल, सेंटर देखने नहीं जाना क्या? आधा रास्ता वैसे भी पार कर लिया हमने, अब तक अच्छा भला तो था, फिर अचानक कैसे?"

"तू सुला रहा है क्या गोद में वो बोल, बाकी प्रवचन मत दे।"

"बाबा रे! अब तो कुछ ज्यादा ही नहीं हो रहा? तू और मेरे गोद में? चल अच्छा आजा सो।"
ये कह भी दिया मैंने और उत्सुकता के साथ वो मेरे गोद में आकर सो भी गया। उसे क्या पता उसके इन नादानियों की वजह से मैं उसमें और फसता जा रहा था। उसके लिए जो मेरे प्यार का समंदर था वो और ही गहरी टोक में बढ़ता जा रहा था।

"क्या मैं तेरे बाल सहला सकता हुँ ?" मैंने उसे छूने की आस से पूछा।

"क्यों? मुझे और गहरी नीदं में सुलाना चाहता है क्या?"

"ना रे ! बस यूँ ही पूछा।"

थोड़ा हताश हो गया मैं, मुझे लगा उसे पसंद नहीं आया मेरा प्रस्ताव। मैं यह सोच ही रहा था कि उतने में उसने कहा- "पागल ये भी कोई पूछने की बात है क्या? कर! मुझे तोड़ा अच्छा लगेगा, माइंड फ्रेश हो जाएगा" उसने मुझे सहमत्ति देते हुए कहा।

"क्या यार डरा दिया मुझे, थोड़ी देर के लिए लगा कि तू गुस्सा हो गया हैं मुझसे।"

" तू! तू ना बहुत सोचता है।" उसने टपली देकर मुझे न सोचने का आव्हान किया।

‘हाँ’, यह एक ऐसा लफ़्ज़ है जो मेरे लिए हमेशा उसके मुंह पर रहता। वैसे उसका ऐसे हमेशा कहना भी जायज़ है, मैं होता ही था इतने ख्यालों में। उसके कुछ कहने से पहले, उसके कुछ कहने के बाद, बस उसके खयालो में।

ट्रेन और समय दोनों ही अपनी रफ़्तार से चल रहे थे। किसी के लिए भी न रुकना की अपनी खासियत से। माना समय किसी का नहीं, पर उसके साथ बिताये सारे पलो को मैं कैद करना चाहता था। मैं चाहता था वो पल वहीँ थम जायें, और मैं उसे जी भरकर देख, आँखों में समा लूं| मैं उसके साँसों की महक चुरा लेना चाहता था, उंगलिया सहलाकर उसके बदन की चाप लेना चाहता था, अपने होठों की कोमलता को उसके नरम होठों को जाँचना चाहता था। पर मुझे पता था कि मेरी मर्यादा क्या है।

वो असमंजस में लग रहा था। ठंडी हवा चल रही थी और साहबज़ादे ख्यालों में खोये थे।

"कितना अच्छा लग रहा है ना?" ठंडी हवाओं का लुफ्त लेते हुए और उसके बालों पर उंगलिया फेरते हुए उसका मन जानने की कोशिश में, मैंने उससे पुछा।

"काहे का अच्छा? इतना दूर सेंटर उस पर ये लम्बा सफ़रऔर नोट्स भी नहीं लाया पढ़ने के लिए”, यह कहते हुए उसने अपनी निराशा व्यक्त की।

वो उदास था इसीलिए क्योंकि उसके पास नोट्स नहीं थे अपना खाली समय भरने के लिए। हाँ खाली समय!! और मैं कहीं भी नहीं। वो भूल गया था कि उसी सुबह उसने कहा था - "हम अगर साथ हैं तो बोर होने का सवाल ही नहीं, बल्कि हमारा दिन अच्छा ही बीतेगा"। मुझे उस समय यह भी लगा शायद मेरी चुप्पी या दिलचस्प गैर बाते उसे बोर ना कर रही हों।

मैंने जिज्ञासा-पूर्ण उससे पूछ लिया - "तू मेरी वजह से तो बोर नहीं हो रहा ना?"

"देख अब बोर कर रहा है तू।"

बस और क्या था मुझे इस कदर उसके इन शब्दों का बुरा लगा कि स्टेशन आने तक मैंने अपना मुँह नहीं खोला। बस चुप बैठा रहा और सोचता रहा कि हमेशा मेरी बातों का गलत मतलब क्यों निकालता है वो।

***

उसकी एक आदत थी अगर वो कभी बाहर जाए घूमने या किसी काम से भी, तो वह नजर में आने वाले हर चाट खाने की इच्छा रखता था। जैसे वो सारी खाने की चीज़ उससे दूर भागी जा रही हो।

सूरज की किरणें अब तक हम पर पड़ी नहीं थीं और सुबह से भी कुछ पेट में गया नहीं था इसीलिए उसे पूछा,

"कुछ खाएं क्या?"

"कितना भूका है बे तू।"

"लो कर लो बात" मेने अपने आप से कहा, मैं सोच रहा था कि उसकी चाह होने से पहले ही उससे पूछ लूं, पर मेरी कोशिश भी उलटी पड़ गई या हमेशा की तरह उसने मेरी बातों का उल्टा मतलब लिया।

"जाने दे तुझे पूछना ही गलत है", कहकर मैंने बात टालना चाहा।

"बुरा लग गया?"

"पता है तो पूछता क्यों है?"

"क्या छोटी- छोटी बातों पे नाराज हो रहा है बे।"

"मालुम नहीं क्यों तेरी बातों का बुरा लगता है मुझे।"

पता सब था, पर जताना नहीं चाहता था मैं और वैसे भी मेरे जताने का क्या अंजाम हो सकता था उससे मैं अच्छी तरह वाकिफ़ था। आती सुबह के साथ सूरज अपनी रौशनी की ताकत दिखाने से पीछे नहीं था। पूरी प्रकृति की ताकत सूरज की किरणों से आ रही थी। धुप की कड़कड़ाहट में उसका पसीने से लिपटा चेहरा मेरे होश उड़ा रहा था। मेरा प्यार जैसे मानों उस तालाब की मछली थी जो उसके पसीने से भरे बदन में डूबना चाहती थी। तब तक मुझे सौवी बार तो लगा ही होगा कि उसके सीने से लिपट जाऊं। पूरा सफ़र उसके हाथों में हाथ थामे पूरा करूँ। पर किस्मत ने यूँ खेल खेला था कि न उसे मैं छू सकता था, न मन के जस्बातों को खुल कर बता सकता था।

"चल अब ज्यादा मुँह मत लटका, कुछ खाते हैं, चल", आखिर उसने रज़ामंदी दी कुछ खाने की।

"क्या खाएं? चाट? साउथ-इंडियन कुछ? मैंने खुशी व्यक्त करते पूछा उससे।

"तुझे पता है न क्या खाना है मुझे?"

"मसाला-डोसा?"

"सही।"

"चल खाते हैं और फिर रिक्शा ले कर सेंटर पे जाते हैं”, कहते हुए हम होटल की तरफ बढे।

नाश्ता करते ही हम हमारी मंज़िल की ओर चल पड़े। सड़क पर लोग रंगो की बारिश में भीग रहे थे। दोनों ओर के मुसाफिर इस आनंद का अनुभव ले रहे थे। बच्चे बोलो या बूढ़े, हर कोई त्यौहार का मज़ा लूट रहा था। रिक्शा में बैठे हम देख पा रहे थे कि सिर्फ मुंबई शहर होली के रंगों में डूबा नहीं रहता, जिस जगह हम थे वो भी मुंबई के मुकाबले कम नहीं था।

"घर जाकर हम भी होली खेलेंगे", उल्हासी लोगों से प्रभावित होकर उसने मुझसे कहा।

"कोई जरुरत नहीं। हम घर जाकर आराम करेंगे। मेरा छोड़, पर तू पक्का आराम करेगा" अपनापन जताते हुए मैंने उसे मेरे शब्दों को मानने के लिए मनाया।

"अब तू बड़ा प्यार दिखा रहा है।"

"मुझे मौका मिले तो कितना प्यार समेटे रखा हूँ वो भी दिखा दूँ", न चाहते हुए भी मुझे ये खुद से कहना पड़ा। "कुछ नहीं ऐसे ही हम सुबह से बाहर हैं न इसलिए" झुटे शब्दों की लिपि-पोती करनी पड़ी मुझे।

***

सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम हो गई। हमने सेंटर भी देख लिया था और घर लौट कर आराम भी फर्मा चुके थे। मेरा मेरे अपने घर जाने का वक़्त हो गया था। निकलते वक़्त मैं वहाँ से खाली हाथ नहीं जा रहा था। भोर से लेकर दिन भर हमने जो भी समय बिताया था उनके कुछ मीठे पल साथ ले जा रहा था। कुछ ऐसी यादें जिनके सहारे मैं अपना खाली समय बिता सकूँ। यादें जिन के सहारे और जीने की आस रखूँ। और यादें जो बीत चुकी थीं पर उन्हें हमेशा मुझमे ज़िंदा रख सकूँ।

"चल मैं चलता हूँ, अगली बार परीक्षा के वक़्त भी मैं हुँ साथ में। मैं आ रहा हूँ, और तू कोई नाटक नहीं करेगा। हम फिर साथ चलेंगे। ठीक है?"

"हाँ, चलना ना। मैंने रोका है क्या तुझे?" मूँह बनाकर उसने मेरी बातों पर हामी भरी।

"और रोकना भी मत" उसे चेतावनी दी मैंने।

मैं दूसरा मौका बिलकुल नहीं छोड़ना चाहता था उसके साथ समय व्यतीत करने का।

"ओये कृष को बाय तो कर", उसने अपने बांझे की ओर इशारा कर मुझे रोक लिया।

"हाँ करता हुँ , वैसे वो किसी को जाते देख रोयेगा तो नहीं?”

"रोता है पर तेरे लिए नहीं रोयेगा, तू अभी अभी दिखा है ना", उसने मेरे प्रश्न का जवाब देते हुए अपनी बड़ी बहन से पूछा - "दीदी कृष किधर है?"

"देख अंदर के रूम में है", दीदी की आवाज़ सुनकर उसने मुझे उसके पीछे आने के लिए कहा।

"कृष बाय! फ्लाइंग किस दो नए मामा को।" उसने बिचारे खेलते हुए कृष का ध्यान अपनी ओर खींचा और कहा।

कृष ने इशारों से और अपने तोतली जबान से मुझे अपने पास बुलाया और कहा कि मैं उसके कोमल गाल को चूमूं। बच्चे की इस प्यारी विनती से मैं प्रफुल्लित हो गया और बिना देर किए मैंने कृष के गाल चूमे और फिर बाय करते हुए निकलने लगा। पर इस बार भी निकल नहीं पाया कृष ने फिर मुझे बुलाया और मुझे गालों को चूमने के लिए कहा, पर इस बार कृष के खुदके गाल नहीं चूमने थे मुझे। इस बार इस साहबजादे के गाल चूमने के लिए कहा था कृष ने।

कृष के इस भोलेपन पर खुशियाँ मनाऊं या शर्माऊँ कुछ समज नहीं आ रहा था। एक तरफ़ वो मन था जिसे खुशी थी कि बच्चे की नादानी से ही सही मगर इस मन को अपने प्यार को व्यक्त करने का मौका तो मिला था। और दूसरी तरफ एक मन था जो प्यार और दोस्ती के बीच फर्क बनाये रखना चाहता था।

"सुना तूने? मैं और किस? और तुझे?", मैंने उसे पूछा।

"कर दे ना। उसकी बात नहीं मानी तो शुरू हो जाएगा इसका रोना।"

"ठीक है।"

बच्चे की बात थी और मन में उड़े लेहरों को भी रोकना था। ज्यादा न सोचते हुए मेने उसके माथे को चुम लिया।

"बस कृष? या और कुछ?" उसकी ओर शरारती निग़ाहें करते हुए पूछा।

ज्यादा न प्रतिक्रिया देते हुए साहबजादे ने मुझे इशारे में निकलने को कहा।

"निकल, नहीं तो सब को चूमने बोलेगा।"

"पागल।"

थोड़ा सा हंस कर मैंने सबको अलविदा किया और घर के लिए निकला।

प्रेम से परीपूर्ण दिन व्यतीत किया था मैंने। वह सफ़र मेरे लिए अविस्मरणीय है।

क्या होता अगर कैलेंडर में ये दिन फिर आता तो?
कुछ नहीं, बस यह होता कि हम साथ और नयी यादें बनाते।

क्या होता अगर इन रास्तों पर मैं फिर गुज़रता तो?
कुछ नहीं, हम साथ फिर इस मोड़ से गुजरते।

क्या होता ग़र वो धुन, जो मेरे प्यार का प्रतिक हुआ करती थी, फिर बजे तो?
कुछ नहीं, बस हम साथ मिल वो गाना गुनगुनाते।

क्या होता अगर प्यार भरा मौसम फिर बनाता तो?
कुछ नहीं, बस इस बार हम साथ प्यार करते।

जे. एस. शैलेश

नमस्ते। मैं जे. एस. शैलेश हूँ। मैं २१ वर्षीया समलैंगिक हूँ। कहा रहता हूँ वह नहीं बताऊंगा पर अपने व्यवहार से लोगो के दिलो में रहना पसंद करूँगा। पसंद की कहे तो मुझे नयी चीज़े सीखना बोहत पसंद हैं.. कुछ भी नया करना पसंद हैं (चाहे वो कुछ भी हो :P) मैं अपने परिवार के साथ जैसा हूँ अपनी असलियत के साथ रहता हूँ। मैंने किसी को अँधेरे में नहीं रखा। हमेशा कोशिश की कि जो हूँ, जैसा हूँ, वैसा ही रहूँ। मुझे सोसाइटी की कही-सुनी बातों से फर्क नहीं पड़ता, जो मुझे सही लगा और जो सही में सही हैं, वही किया और आगे भी करने की हिम्मत रखूँगा। मैंने अपने प्यार के बिछड़ने के याद में कुछ शब्दों को जोड़कर स्याही की मदत से पन्नो पे सजाया हैं।हलाकि ये मेरी पहली कोशिश हैं। आशा हैं की सभी को पसंद आये और मुझे और लिखने का मौका मिले। धन्यवाद!