बड़ा था दिल... छोटी थी बात

हुई थी ऐसी शुरुआत
अंजानो ने की बात
बातो के साथ बड़े
दोस्ती के हाथ
पर नजाने दिल को क्यों लगा
बड़ा था दिल...
छोटी थी बात

दोस्ती की
दोस्ती जैसी बात
पर दिल को हुआ
प्यार का पहला एहसास
दिल ने ये भी माना
'मांग रहा है दिल
दिल से प्यार का साथ'
पर भी दिल को लगा
बड़ा था दिल...
छोटी थी बात

अंजाना लगा रहा था
दिल में बसने
बुन रहा था दिल
हर पर सपने
पूछ रहा था मन उसे
'क्या हो तुम मेरे अपने?'
आगे बड़ रहे थे कदम
बन रही थी बात
नजाने फिर भी दिल को क्यों लगा
बड़ा था दिल…
छोटी थी बात

दिल को बताने,
मन में ठहरे जस्बात
पर दिल ने कहा
दिल को भुलाने
कहकर, "होना नहीं बर्बाद"
तब दिल को लगा
छोटा था दिल...
बड़ी थी बात

जे. एस. शैलेश

नमस्ते। मैं जे. एस. शैलेश हूँ। मैं २१ वर्षीया समलैंगिक हूँ। कहा रहता हूँ वह नहीं बताऊंगा पर अपने व्यवहार से लोगो के दिलो में रहना पसंद करूँगा। पसंद की कहे तो मुझे नयी चीज़े सीखना बोहत पसंद हैं.. कुछ भी नया करना पसंद हैं (चाहे वो कुछ भी हो :P) मैं अपने परिवार के साथ जैसा हूँ अपनी असलियत के साथ रहता हूँ। मैंने किसी को अँधेरे में नहीं रखा। हमेशा कोशिश की कि जो हूँ, जैसा हूँ, वैसा ही रहूँ। मुझे सोसाइटी की कही-सुनी बातों से फर्क नहीं पड़ता, जो मुझे सही लगा और जो सही में सही हैं, वही किया और आगे भी करने की हिम्मत रखूँगा। मैंने अपने प्यार के बिछड़ने के याद में कुछ शब्दों को जोड़कर स्याही की मदत से पन्नो पे सजाया हैं।हलाकि ये मेरी पहली कोशिश हैं। आशा हैं की सभी को पसंद आये और मुझे और लिखने का मौका मिले। धन्यवाद!