पिंजड़ा

आखिर,
पिंजड़े से आज़ादी
एक पंछी से
बेहतर कौन समझे?

लोहे के शिकंजो में क़ैद ,
अरमान ख़ूबसूरत उसके,
साहस से बुलंद चाहत उसकी
निर्भीक-निडर होंसला उसका
पर ,
घबराहटों को समेटती सी
शक्सीयत उसकी|

हर रोज़ सुबह
प्रार्थना करती
कि
हे देव!
मेरे उड़ने की चाहत से
मुझे अँधा न करना,
अपने कुटीर को संभाल पाऊँ,
मुझे इतनी हिम्मत देना
मुझे अँधा न करना।

अपने जस्बातों को संभाल फिर
वह दिनचर्या में लगती
अपनी भावनाओं को समझने का
वही जंघ झूझती
पता न लगता उसको
कि क्या है ज़रूरी ज्यादा,
अपने अरमानो का गला घोटकर
पिंजड़े में रहने की माया,
कि
स्वछंद आसमान से
धरा पर, पड़ती
उसकी स्वतंत्र काया।

आदित्य शंकर

मुजफ्फरपुर, बिहार में जन्में आदित्य शंकर हालाँकि आई.आई.टी. मुंबई में विद्युत् अभियांत्रिकी के छात्र हैं, मगर वो खुद को एक फ़िल्मकार, आर्टिस्ट, एवं राजनीती के प्रति जिज्ञासु के रूप में पहचानते हैं| २०११ में इन्होंहे अपनी समलैंगिकता को स्वीकारा और ये यूट्यूब पर पूरे विश्व के सामने कमिंग आउट करते दिखे जिसकी वजह से इन्हें "संयुक राष्ट्र" के एक पैनल में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ|