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कहीं किसी दूर दराज़ कोने में बैठा सिसकता सा मेरा मन एक छोटे बच्चे जैसा रोये जा रहा था| आखिर रोता क्यूँ नहीं, उस बच्चे को वह खिलौना न मिल पाया था जिसकी उसे तलाश थी|

मेरे स्वप्नों में अभी भी वही एक आवाज़ मुझे सताती थी| सोते सोते मेरे जी को मचलाती थी| साहिल पर लहरों के थपेड़ों को सुनता था मैं इस चाहत में कि कहीं मेरी ज़िन्दगी की आशाओं को पूरा कर सकने का रास्ता मिल जाए| शायद मुझे वो लड़का मिल जाए जिसके साथ हज़ार मौसम बिताना चाहता था मैं|
१ निराशा : : #अनुभूति

फिर दिनचर्या में लीन मेरे मस्तिष्क में वह आहट कभी कभी दस्तक दे जाती| पूरे काम काज पर ताला लगा जाती| पर फिर भी दिल-ओ-दिमाग के इस द्वन्द में मुझे विजयगान सुनाती, मुझे रास्ता दिखाती- उसके प्रेम में सताती यादें|
२ कार्यकाल ||

लगता था की पूरा जीवन सिमटे जा रहा हो उस दूर दराज़ कोने में| सारे रंग, सारा प्रकाश, केन्द्रित हो उसी कोने में| आलसी बना दिया देखते ही देखते मुझे| समृद्धि दिखी न मुझे बाहर कहीं| घर घरोंदा बना उसी कोने में मेरा हर रोज़ उसी एक आवाज़ की गुनगुनाहट में, उसी एक साए की सरसराहट में|
३ आनंद ::शीशमहल||

प्रफुल्लित मै झूम रहा था | शरीर की हर एक कोशिका में एक नया तरंग था| प्रफुल्लित वो भी झूम रहे थे| फिर देखते ही देखते हर मृगतृष्णा ओझल हुई आखों से और वह शीशमहल चकनाचूर हुआ|पर मै बच गया, उसी कोने की वजह से जिसके प्रांगन में यह महल अस्तित्व ग्रहण कर चुका था| आखिर कोने की बुनियाद जो अटल थी|
४ तिमिर और पुनः प्रकाश :: #स्वानुभूति ||

तो फिर वो बालक उसी कोने से लिपटे रोता रहा| पर इस बार बात अलग थी| उस महल की परवरिश में मुझमें जो जड़ता आई थी अब उनकी कठिन परीक्षा थी| कोने पर केन्द्रित नहीं थी मेरे सहमे चहरे की लालसा| तो वह बालक उठा , उस कोने को छोड़ दूर दौड़ने लगा, जोर से, फिर देखते ही देखते गिर पड़ा अचम्भे से| जिन चीजों को भूल चूका था वह उसे अहसास दिलाने लगे कि आखिर समृद्धि सारे विश्व में व्याप्त है| शीघ्र ही रंगीन और प्रकाशमय यह विश्व, उसे अच्छा लगने लगा|
५ स्मरण :: #काव्यानुभूति||

पर चाहे मै खुद को उस कोने से छुड़ा पाया था परन्तु उस साये से नहीं| साया वह अब ज्यादा करीब लगने लगा पर इस बार बात कुछ और थी| इस पूरे समय मेरे अधरों पर कई भाव आए और गए| चहरे पर रसों की पूरी श्रंखला दिखाई पड़ती थी| पर अब सब कुछ आनंदमय लगता है| होठों पर एक तनाव सा महसूस करता हूँ हर वक्त| कपोलों से रत्न सी प्रभा उमड़ते हुए मेरे साथ मेरे अतीत को रोशन करती है| यह सब अब मेरी मुस्कुराहटें बयान करती हैं|

इस पूरे अनुभव पर मेरे मस्तिष्क की क्रिया प्रतिक्रिया के, रचनात्मक एवं रहस्यमय भावों के संस्कार, मेरे अतीत को बांधे, वर्तमान को संभाले और भविष्य को सँवारे चलते हैं| मै सिर्फ मुस्कुराता हूँ| माना कि शायद काफी ज्यादा|
बालक अब वह बड़ा हो रहा है|

smile emoticon

(किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन में अनुभवों के तीन स्तर उसके स्वाभाविक दृष्टिकोण की स्थापना करते हैं| अनुभूति, स्वानुभूति और काव्यानुभूति - अनुभव के ये तीन स्तर हमारे किसी भी कलात्मक या व्यवहारिक शक्ति के अग्रज रहते हैं| इनकी समझ और इनका प्रयोग हमें हमारे रचनात्मक सर्वश्रेष्ठ की शिखर पर स्थापित करता है|)

आदित्य शंकर

मुजफ्फरपुर, बिहार में जन्में आदित्य शंकर हालाँकि आई.आई.टी. मुंबई में विद्युत् अभियांत्रिकी के छात्र हैं, मगर वो खुद को एक फ़िल्मकार, आर्टिस्ट, एवं राजनीती के प्रति जिज्ञासु के रूप में पहचानते हैं| २०११ में इन्होंहे अपनी समलैंगिकता को स्वीकारा और ये यूट्यूब पर पूरे विश्व के सामने कमिंग आउट करते दिखे जिसकी वजह से इन्हें "संयुक राष्ट्र" के एक पैनल में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ|