सोहम


"सोहम, अमेरिका में रहकर पता चला की यहाँ की ज़िन्दगी बहुत अलग है. गे बार्स, पब्स इन सारी जगहों पर गया, कुछ लोगों के बहुत करीब भी गया. और पीछे मुड़ कर देखा तोह पता चला की हमारे बीच के रिश्ते के बिखरे हुए कुछ टुकड़े ही बचे हैं. अब अगर हम एक दुसरे को ना मिले तोह ही अच्छा. हम ने एक साथ ज़िन्दगी बसर करने का वादा एक दूसरे से किया ज़रूर था. पर अब मुझे वह दूर रह चूका हुआ एक सपना ही लगता है. प्लीज मुझे फ़ोन मत करना. तुम से बात करने का धैर्य नहीं जुटा पाऊँगा!"

मेरा सर चकराने लगा. यह क्या पढ़ रहा था मैं? कल ही मनीष की माँ से फ़ोन पर बात की थी, उनकी तबियत के बारे में पूछताछ की. और आज ही शाम को मैंने आई.आई.टी की अपनी एक सहेली को मेरे और मनीष के बारे में बताया था. मेरी उस दोस्त ने भी खुले दिल से इस बात का और मनीष और मेरे रिश्ते का स्वीकार किया था. रात भर हम उस पब के डान्स फ़्लोर पर अपनी दोस्ती के इस नये पर्व का मानो उत्सव मना रहे थे.

और आज येह ई-मेल. मैं अपने आई.आई.टी छात्रावास के छोटे से कमरे में ज़मीन पर गिर गया. मुझे ठीक से याद भी नही, पर शायद मैं ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था. क्योंकि पड़ोस के कमरे में रहने वाला मेरा एक दोस्त दरवाज़ा ठप-ठपाने लगा. मैने किसी तरह पोन ढूंढकर अंश को फ़ोन लगाया. एक वाक्य भी पूरा ना कर पा रहा था. कुछ अधूरे से शब्द मेरे मुँह से निकले और मैने फ़ोन रख दिया. उसके तुरंत बाद मैने मनीष को फ़ोन लगाने ला प्रयास किया. घार-पाँच बार कोशिश करने पर भी फ़ोन नहीं लगा. आज एक साल पूरा होने के बावजूद मनीष का फ़ोन नही लगा है.

मनीष और मैं तीन साल पहले गे बॉम्बे की मीट में मिले थे. फिर मुलाकातें बढ़तीं रहीं और एक दिन टैक्सी में मनीष ने प्यार का इज़हार किया. आग दोनो तरफ़ से बराबर लगी थी. एक सुंदर सपने की तरह हमारा रिश्ता खिल गया. आस-पास गे और स्ट्रेट लोगों का साथ था जो हम दोनो को जानते और समझते थे. हम एक-दूसरे के परिवारों से मिलने लगे. एक साथ बाहर घूमने जाने लगे. एक दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारी का अनुभव महें हो गया था. ढ़ाई साल साथ बिताने के बाद मनीष अमेरिका चला गया और एक महिने में ही सब कुछ खतम हो गया था. उस ईमेल को पढ़ने के बाद मैने अपनी ज़िंदगी की पहली सिगरेट जलाई.

और शायद अपने ज़िंदगी की पंदरहवी सिगरेट येह कहानी लिखते हुए जाला रहा हूँ. मुझे याद हैम मेरी आयु शायद छह या सात रही होगी. हमारी हाऊसिंग सोसाइटी के सब बड़े भईया जब मेरे दोस्तों को कंधों पर लेकर गणपती विसर्जन के समय नाचा करते थे, तब मुझे कुछ अलग ही महसूस होता था. मेरे उन दोस्तों के प्रति ईर्ष्या और उन बड़े भाइयों के प्रति अलग सा आकर्षण. एक बार ज़िद्द करके फ्रॉक ख़रीदा और फ्रॉक पहनकर ही घर के बाहर खेलने गया. सारे लोगों ने मेरा मज़ाक उड़ाया. मेरे माता पिता भी शर्मिन्दा हुए. और इन दोनों चीज़ों की वजह से मैंने अपनी सोसाइटी में इंटरैक्ट करना पूरी तरह से बंद कर दिया. सब की नज़र में वह मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं यही लगता था.

स्कूल की कहानी भी कुछ अलग नहीं थी. "ऐ बायल्या", यह सम्बोधन मैं कई बार सुन चूका था. कक्षा में पहले बेंच पर बैठता और पीछे मुड़के देखने से भी डरता था. स्कूल में हर सब्जेक्ट में अव्वल आने वाला मैं पी.टी. के पीरियड से बेहद डरता था. एक बार पी.टी. के सर ने मुझे स्कूल को दो चक्कर लगाने की सजा दी थी. और वजह थी - की मैं "उस" तरह चलता/बोलता था. बाद में सब कुछ बढ़ने लगा क्लास के लड़कों के प्रति आकर्षण भी, और मेरे अपने आप के प्रति घृणा भी. विशाल नामक मेरे एक क्लास्मेट को देखकर अलग सा लगता था. वह जब बात करता, तब देखते रहने का मन करता था. एक बार स्कूल गैदरिंग में हम ने एक नाटक में हिस्सा लिया. उस नाटक में हम दोनों राजकुमार हैं और हम दोनों एक दुसरे को गले लगाते हैं ऐसा प्रसंग था. जब विशाल मुझे गले लगाता था, तोह अलग ही लगता था. एक बार प्रैक्टिस के दौरान मैंने विशाल की कमर पर हाथ रख दिया. उस के बाद पूरे स्कूल में मानो एक कोहरा सा आ गया. मैं अब "होमो" था.

पूरे स्कूल में हर्षा को छोड़कर मेरा कोई दोस्त नहीं था. क्योंकि हर एक की नज़र में मुझे हँसी नज़र आती थी, मज़ाक नज़र आता था. मेरे ही स्कूल में तीन क्लास बड़े मेरे भाई ने कई बार मुझे एकांते में कहा "छी! तू कैसा होमो जैसा बिहेव करता है. शरम आती है तेरी." मैं दिन ब दिन अकेला हो गया था. मेरे शरीर तक से मुझे नफ़रत होने लगी थी. मैं अ‍ॅक्चुअली अपनी परछाई को भी देखने से कतराता था - कहीं उस में से भी मुझे मेरे 'बायलेपन' की झलक देखने को मिल जाये!

कॉलेज में जाने के बाद भी बात कुछ खास बदली नहीं थी. पर फिर एक दिन घर पर इंटरनेट आया. चैट रूम्स में लड़की के नाम से मैं चैट करता था. लड़कों का इतना ध्यान आकर्षित कर लेता था कि बहुत अच्छा लगता. एक दिन मेरा ध्यान "मैन टू मैन" रूम की तरफ़ गया. मैं वहा जाने लगा और एक अलग दुनिया मेरे सामने खुली हो गयी. उसके बाद मैने काफी वेब्साईट्स देखीं - इन में से बहुत वेब्साईट्स में अनसुने शब्दों का अर्थ समझाया गया था. आई-बाबा और दादा सोने के बाद मैं वहा जाता. एक-दो बार उन चैट रूम्स से मिले हुए लोगों को घर का लैंड्लाईन नम्बर भी दिया. एक अलग से उत्साह मेरे अंदर भर गया था.

उम्र के 20 साल पूरे होने तक मै पाँच-छह लड़्कों से करीबी बना चुका था. तब मैने इंजिनियरिंग की पढ़ाई शुरु कर दी थी. उसी दौरान मैंने गे बॉम्बे के बारे में सुना. उनकी पर्टीज और मीट्स हुआ करती थी. पर्टीज जाना मुमकिन नही था और पार्टीज याने शराब और ड्रग्ज, ऐसी मेरी धारणा थी. इसकी वजह से मैं कुछ बार मीट्स के लिये गया. वहा मैं लघबघ हमेशा शांत ही रहता था. इतना ही नहीं, अब भी जब किसी भी मीट में जाता हूँ तब मैं शांत ही रहता हूँ. मैं गौर से मीट में आये हुए लोगों को देखता हूँ - और हर मीट के बाद, बिना ज़्यादा कुछ बोले, मैं अपने आप के लिये कुछ बातेण सीख कर लौटता हूँ. खैर,इन मीट्स को जब मैं जाने लगा तब मुझे "गे" इस शब्द का असली मायना पता चला. "गे" का मतलब केवल छुप-छुप कर एक दूसरे के साथ शारीरिक सम्बंध रखने वाले व्यक्ति ही नहीं, बलकि एक पुरुष को अपने जीवन साथी के रूप में देखने वाला पुरुष येह भी होता है, इसका पता चला. इन्ही गे बॉम्बे की मीट्स में मेरी अंश से मुलाकात हुई. आज अंश, जो कि गे है, मेरा सब से अच्छा दोस्त है. एक साथ फ़िल्म देखना, बाहर घूमने जान, येह सब हम साथ करते हैं. हम एक दूसरे के हर सुख, हर दुख में एक दूसरे के साथ रहे हैं. "हम ने अपने माता-पिता को अपने बारे में बताना चहिये" ऐसा बार बार लगता है. "पर फिर उनके क्या सवाल आयेंगे, क्य वोह समझ पायेंगे?" इन सारे सवालों के जवाब ढूंढने से अच्छा शायद हम इस बात को दबा ही दे.

गे बॉम्बे की मीट्स जाकर मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया था. बारह्वी कक्षा में मिले हुए काम अंक अब इंजीनियरिंग में दिखाई नहीं दे रहे थे. पढ़ाई के साथ साथ ही, नाटक और स्पर्धाओं में हिस्सा लेने लगा. और धीरे धीरे मुझे खुद ही का मोल समझ आने लगा. बीच बीच में "बेल्या" यह शब्द सुनने को मिलता था और बुरा भी लगता था. पर मैं अपनी पढाई में और अन्य कार्यक्रमों में इतना लीं था, की उस बात की तरफ ध्यान देने के लिए भी मेरे पास समय नहीं था. इंजीनियरिंग के आखरी साल तक मैं मंच पर खड़ा रहकर बात में करने में एक अलग किस्म की स्फूर्ति महसूस करने लगा. मैंने अपने इस अलग पहचान के साथ साथ मेरे अन्य गुणों को बढ़ावा देना शुरू किया.

उस के बाद पदव्युत्तर पढ़ाई के लिए मैंने आई.आई.टी. में प्रवेश किया - और मेरी पूरी ज़िन्दगी पलट गयी. छात्रावास और वहा के दोस्त, वह खुला वातारण और गे बॉम्बे की पार्टीज को भी जाने का अवसर, इन साड़ी चीज़ों की वजह से मैं बहुत खुश रहने लगा. मेरा मित्र परिवार जिस तरह बढ़ता गया और जैसे जैसे मुझे यह अनुभूति हुई की मैं अकेला नहीं हूँ, वैसे मेरी अपने आप को देखने की दृष्टि भी बदल गयी. आई.आई.टी. में मेरी पढाई अच्छे से चल रही थी - और साथ में देश के कोने कोने से आये हुए गे या मुख्यतः कन्फ्यूज्ड लोगों को प्लेनेटरोमियो पर मिलता रहा. आई.आई.टी. के बहुत से गे छात्रों से मेरी घनिष्ट दोस्ती भी हुई. पर साथ ही काफी सारे ऐसे भी थे जो अपने व्यक्तित्व के इस हिस्से को एक 'प्रभाव', एक 'आदत', एक 'दौर' बताते थे. आई.आई.टी. में काफी कल्चरल एक्टिविटीज में हिस्सा लेने लगा - वक्तृत्व, नाटक, लेखन, चित्रकला. उसके साथ वहा के कुछ दोस्तों को मैंने अपने गे होने के बारे में बताया. उन्होंने मेरा खुले दिल से स्वीकार किया.

आई.आई.टी. में एक बार एक वक्तृत्व स्पर्धा का आयोजन किया गया जिस में”377" यह विषय दिया गया था. सारे बाकी के स्पर्धकों ने 377 के अलावा बाकी के विषयों पर बात की - पर मैंने 377 पर बात करने का निश्चय किया. एक काल्पनिक दोस्त का उदाहरण देकर मैंने 377, गे इन संकल्पनाओं को श्रोताओं के सामने रखा. कमाल की बात यह है की मेरे बहुत सारे क्लासमेट्स जो मुझे लगा था की बिलकुल नहीं समझेंगे, इस विषय पर एक दुसरे से खुल कर बात करने लगे. मुझे आज भी उस भाषण की आखरी पंक्तियाँ याद है,”मेरा दोस्त हस्त है, रोता है. माता-पिता के लिए चिंता करता है. सपने देखता है. मेरा दोस्त जीता है और प्यार भी करता है. बस वह आप की तरह भिन्न लिंग के व्यक्ति से प्यार नहीं करता. क्या आप उसका तिरस्कार करेंगे, क्यूंकि वह प्यार करता है?"

मैंने जब अपनी चचेहरी बेहेन को अपने गे होने के बारे में बताया तब उसकी प्रत्रिक्रिया भी कुछ ऐसी ही थी.”तुम ने अपनी पढाई में अच्छी चीज़ें हासिल की है. इस एक चीज़ की वजह से मैं क्यों तुम्हे अलग मानू?" मेरी यह बेहेन आज मेरे सब से करीबी लोगों में से एक है. उस ने अपनी एक शादी के पूर्व अपने बॉयफ्रेंड को (और अब के पति को) मेरे बारे में बताया था. मेरे जीजा ने भी मुझे दिल से स्वीकार किया. उसके बाद मैंने अपने कुछ रिश्तेदारों को भी अपने बारे में बताया.

खैर. आज की तीसरी सिगरेट जलाते हुए जब मैं अपने आप को याद करता हूँ, तब मुझे याद आता है स्कूल में अपनी परछाई से डरने वाला मैं... और कुछ महीनो पहले मुंबई के गे प्राइड मार्च में बिना किसी मुखोटे के सर उठाकर चलने वाला मैं. कितना अंतर है मेरे ही दो रूपों में. बचपन में मेरा कोई दोस्त नहीं था. आज इस मार्च में हज़ारो एलजीबीटी और उनके समर्थकों के बीच मैं चल रहा था. अनजाने भी आज दोस्त बन रहे थे. मेरे साथ चल रही मेरी एक लेस्बियन दोस्त (जो स्कूल में मेरे साथ पढ़ती थी), "तुम लोग मुझे स्कूल में चिढ़ाया करते थे. आज मुझे अपनाने वाले केवल गे ही नहीं पर स्ट्रैट लोग और रिश्तेदार हैं. आज मैं इस मार्च में हूँ. यह मार्च मानो कोई त्यौहार ही है. यहाँ आये हुए हर इंसान का भगवन एक है और इच्छा भी एक है - सम्मान से जीना." प्राइड मार्च को 'प्राइड' मार्च क्यों कहते हैं, इस बात का पूर्णतः अनुभव मैंने उस दिन लिया. मेरे इस पहले प्राइड मार्च को मैं कभी भूल नहीं पाउँगा.

अब मैं पुणे में रहने लगा हूँ. शायद 'उतना' नहीं पर कुछ हद तक बायल्या आज भी हूँ. उस दिन ऑफिस का एक दोस्त मुझे बोला, "आदि, आप तोह एंग्री यंग मैन हो. सॉरी, 'मैन' गलती से बोला." मैंने चेहरे पर की एक मक्खी भी ना उड़ाकर बड़ी शान्ति से उसे कहा, "जब तक तेरी चड्डी में हाथ नहीं डालता, तब तक तुझे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए ". मेरे इस अनपेक्षित उत्तर से वह भी अचंभित रह गया - और अपने काम पर लग गया.

तो, डोम्बिवली के एक सामान्य मध्यम-वर्गीय मराठी परिवार में जन्मा हुआ, छह-सात सालों से खुद की गे पहचान को अपनाया हुआ, तीन साल के दृढ़ प्रेम के अस्त पर बिखरा हुआ पर मेरे साथ प्यार और सम्मान से पेश आये हुए लोगों की वजह से सशक्त बना हुआ... मैं एक सामान्य 25 वर्षीय मराठी गे माणूस.

Soham

सोहम एक गे पुरुष है. यह कहानी उसने कई वर्षों पहले लिखी थी.